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चैनल: थोड़ा सा आसमान


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ब्लॉग्स (152)
यूँ हीं नहीयूँ हीं तो नही कभी भी कभी बैठा नही यूँ हीं और कभी चला भी नही सब कुछ किया मकसद से हमेशा चला उधर, जिधर लगा कि मंजिल है भागता रहा ख्वाब ख्वाब, परवाह नही की ख़ुरदुरी जमीन और ऊबड़ खाबड़ रास्तों की, सब तय किया जैसा भी जरूरी लगा उस वक़्त याद नही रखा- ... आगे पढ़ें...

मैं कृतग्य हूँ मैं कृतग्या हूँ उस जीवन के प्रति जो मुझमें और तमाम अन्य जीवों में लगातार साँसें ले रहा है मैं कृतग्य हूँ उस सूरज के प्रति जिसने ऊर्जा भेजने में कभी कोई चूक नही की और जिसके बिना अकल्पनीय थी हमारी सर्जना मैं कृतग्य हूँ उस प्रकृति के प्रति ... आगे पढ़ें...

तुम अपना सिर टिकाओ तो सही देखो, मैं अपना कंधा बढ़ा चुका हूँ. देखो जरा गौर से, मेरे शरीर का रोम-रोम तुम्हारे दर्द सोखने को तैयार खडे हैं. तुम अपना हाथ मेरे हाथों में रख दो, मेरा वादा है तुम्हारी लड़खड़ाहट को अपनी कदमों पे ले लूँगा हाँ, दे ही दो तुम मुझे ... आगे पढ़ें...

शहर या तो अलग अलग क़तारों में ख़ड़ा है बंटा हुआ, याफिर उपस्थित हैदौड़ता हुआ भागदौड़ क़ी परिधि पे, अपनी पूरी थकान के बाबजूद शहर को मैने कभी फुरसत में नही देखा ना हीं कभी एकजुट. बहुत बड़ी-बड़ी कतारें उपस्थित हैं बहुत छोटी-छोटी जगहों में जगह के बीच से जगह ... आगे पढ़ें...

एक डगमगाता हुआ विश्वास गिर कर टूट जाने के लिए है एक दम बेताब एक उबलती हुई सनसनी फैल जाने के लिए है एक दम तैयार छोटी छोटी नाकामियों पर एक क्रोध हर समय आपे से बाहर होता हुआ जैसे बैठा हो गेहूंवन कि लिबलीबी पर दया, प्रेम, करुण और मुस्कान सब सतही, नियत और ... आगे पढ़ें...

मुझे तुझमे थोड़ी देर और रूकना था अब तक तो सोते हुए गुजर गयी थी अब जागना था जग कर जीना था कुछ जागे पलों को इकठ्ठा करने तक और रूकना था बीज के खोल से बाहर निकल कर अंकुराना था, माटी पकड़नी थी, कम से कम कोंपलों के आने तक और रूकना था पनाह में तेरे, खुद को डाल ... आगे पढ़ें...

कुछ मैं नही छोड़ पाया था कुछ वो भी नही छोड़ पाई थी और इस तरह हम छूट गये थे एक दूसरे से जब धार पे ख़ड़ा हो तो कितनी देर रुका रह सकता है कोई बिना बहे, और उस धार में तो हम तिनकों जैसे थे. वो जो हम नही छोड़ पाए थे तब वो सब भी छूट गये धीरे धीरे वक़्त ने नयी ... आगे पढ़ें...

यादें रुकती नही हैं तब भी नही रुकी थी वे बरसती रही थी आँखों के कोरों से सुबक-सुबक कर. रुकी तो वो भी नही थी चली गयी थी आँखों से निकल कर अपनी ज़िद में सब छोड़ कर सब बह गया, बुझ गया था धीरे धीरे सूख गया सब समय के साथ पर इतना भी नही सूखा कभी कि फिर कोंपलें ... आगे पढ़ें...

तेरे चले जाने के बाद का अंतराल है ये अंतराल, जहाँ है हर शै में लिपटी तेरे साथ गुजारी संपूर्णता बिस्तर पे फैला हुआ अंतहीन संतोष भेलवेटी सोफे पे आकार में ढली तेरी सांस और सोंच की उष्णता भरा हुआ आंगन और किचेन ऑफीस से लौटने के बाद कभी गर दिख भी जाता है ... आगे पढ़ें...

बीच का पूलटूट भी जायेतो भीरिश्ते भर-भरा करगिर नही जाते.वेकिनारे पे खड्रे इंतिज़ार करते रहते हैकिकब ये पूलजुड़ेऔरफिर वे चले. आगे पढ़ें...

यहाँ कोई नाम नही है जिसे मैं पुकार लूँ थोड़ी देर के लिए और वो आ जाए थोड़ी देर के लिए यहाँ कोई कंधा भी नही है जो टिका ले मेरा हाथ कुछ देर के लिए यहाँ गलियाँ, मुहल्ले और सड़कें भी नही है जहाँ आदमी बचता हो आदमी के लिए गैर तो गैर, मुझे कई बार लगता है कि यहाँ ... आगे पढ़ें...

जब जब मैं उदास हुआ वो भी हुआ उसने अपनी लहरें खोल दी समेटने के लियेमेरी बेचैनियों और उदासियों को. जब मैं रोना चाहता था पर आँसू नही होते थे तो उसने आंखो को आंसू दिये और घंटों तक अपने कंधे का किनारा दिया. हमने देखा है और वो समेटता रहता है अपनी लहरें फैला ... आगे पढ़ें...

हो एक शहर छोटा साऔर उसमे एक घर छोटा सा जिसमे हवा से हल्की दीवारें और रोशनी की खिड़कियाँ खुशबु तक की पगडंडी हो वहाँ से और रातें हल्की-हल्की ठंढी हो वहाँ पे परछाइयां बिगड़ती ना हो तन्हाइयां ठहरती ना हो सीधी सफेद बातें हो धुन में लिपटी रातें हों रिश्तों की ... आगे पढ़ें...

धूप लादे हुए अपने पीठ पर चलते रहने का किरदार मिला मुझे. पहुँचाने का, उन-उन हिस्सों में धूपजहाँ कोई रुकावट हो रोशनी के लिए मैं जहाँ भी गया बिठाया गया मुझे एक अहम किरदार मान कार चलता रहा मैं भी जोश में बिना थके, बिना रुके खुशी-खुशीपर चलते हुए ये भूल गया की ... आगे पढ़ें...

सालों साल फटी, उघडी देह में जीते हुए तुम्हारे आने की आस तापती रही और हमेशा उस किनारे से लगी रही जहाँ से तुम्हारी धार गुजरनी थी आज भी खड़ी हूँ तू किधर से भी आ मैं बह चलूंगी. आगे पढ़ें...

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