इबारतें तुम्हारी, उगती रहती हैं मेरे कान टिके रहते हैं उन परये इबारतें, जो तुम्हारे फिर फिर अंकुरित होने के निशान हैं, गुमान है मेरे लिए कि तुम हरे हो अब तक कि तुम्हारी इबारतों में मेरी नमी का जिक्र होता रहता है कि तुम कहते हो ‘सब मेरी नमी की बदौलत उगता ... आगे पढ़ें...
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जानती हूँ छू लूँगी तुम्हारा हृदय पहुँच जाउन्गी तुम्हारे अंतरतम् तक, कभी भी इस जनम से उस जनम तक, और तुम मुस्कुरा दोगे मेरी छुअन को महसूस करके और तब तुम्हारे अंदर क़ी पूरी कायनात गुदगुदा जाएगी और सच मानो, तमन्ना भी यही है……… इससे रत्ती भर भी ज्यादा ... आगे पढ़ें...
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आदमी मुस्कुराता है मुझे फक्र हैहर मुस्कुराते हुए आदमी परनही हमेशा, कभी-कभी हीं सही पर अभी भी जारी है आदमी का मुस्कुराना मेरी कल्पना में अक्सर जीवित हो उठता है वो दृश्य जिसमें छह अरब लोग एक साथ मुस्कुरा रहे हैं उस दृश्य में धरती का आयतन वर्तमान से कई गुणा ... आगे पढ़ें...
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ना कोई आर्किटेक्ट ना प्लान घर बनवा दिया पापा ने ना ड्राइंग रूम को बड़ा बनवाया ना किचेन में एग्ज़ॉस्ट फॅन के लिए जगह छोड़ीवायरिंग भी ठीक से नही करवाई पवार प्लग तो एक भी डलवाया हीं नही ऐसा अक्सर सोंचना हो जाता था जब मैं ज्यादा छोटा था और थोड़ा बड़ा हो गया ... आगे पढ़ें...
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जब भी चूम लेता हूँश्वेत्-श्याम तस्वीर में तेरे होटो कोवे सुर्ख लाल हों जाती हैं आगे पढ़ें...
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अपनी आँखें बढ़ा कर खींच लिया उसने नींद के उस तरफ मुझको, आवाज़ जो आने को थी बुझा दिया उसको लबों पे मेरे, उंगली रख के फिर हौले से उठा दी उसने चेहरे से हया और खोल दी गाँठे एक के बाद एक, जो अब तक बंद थी किसी संदुकची में जमी हुई साँसें पिघल गयी और जिस्म ने भी ... आगे पढ़ें...
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एक लंबे समय तक अलग रह जाने के बाद, फिर से अपने शहर में लौटना काई चीजों से एक साथ जुड़ जाने जैसा होता है जो गलियाँ और रास्ते जो खिड़कियाँ और छतें जो पेड़ और बगीचे स्मृतियों में अपनी जगह बचाते-बचाते लुप्त हो रहे होते हैं अपने शहर में लौटना उन सबों को एक ... आगे पढ़ें...
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लब्ज पसरे हुए हैं खाली कैनवास को महसूसते हुए रात भर इक नज्म क़ी मिट्टी कोडते रहे वो सारी रात सांस फंसी रही उनकी मिट्टी में ना कोई शक्ल बनी नज्म क़ी ना घुमड़ती तलाश को मिला कोई सुर्ख रंग बस लम्हा-लम्हा खाक होती गयी रात. उसे बस छिप कर चुप हो जाना था, सुर्ख ... आगे पढ़ें...
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मकान पक्के होते गयेऔर दीवारे भीपक्के और सख्त साथ- साथदर्द सुनने के लिए न कान रह सके खुलेऔर न दिल के कोशे उनकेबारीक से बारीक पोर भीपाट दिए गयेगारे-चूने सेकंपकपाती निरीह कराहेंउन दीवारों के दोनों तरफ किसी कोलाहल का हिस्सा ही लगती रहींआसुओं से भींग करढह जाने ... आगे पढ़ें...
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आज कुछ यूँ सलीके से शाम हुईदो नजरें, दो नजरों की गुलाम हुईंसात शब्द मिल नही पाए एक नज्म यूँ गुमनाम हुईअधुरा सा रुबरु रख गया थाऔर इंतिज़ार में जिंदगी तमाम हुईवही कागज है, और वही तकलीफहर्फ लाख बदलें, वही कलाम हुई आगे पढ़ें...
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एक रिश्ता, जिसे बेहद खूबसूरती के साथ सिर्फ इक सोंच में तराशा गया,सिर्फ आरजुओं में समेटा गया एक रिश्ता, जो मिल गया था कभी यकायक किसी मोड़ पे या सीधे सपाट रास्ते पे कहीं और जो जाते वक़्त बाँध ले गया इक डोर से एक रिश्ता,जिसमेंएक जगह कभीबैठ नही पाई दो ... आगे पढ़ें...
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आज अरसे बाद कैमरे में है भूख भूख पीटते हुए दिखाए जाए रहे हैं आंध्रा प्रदेश के एक गाँव में ओडिसा के भूख पुराने हो चुके अबबमों से मारे गये या बाढ़ से तबाह हुए लोग चैनल की टी आर पी रेट पर कुछ खास कमाल नही दिखा पा रहे थे सो भूख की फसल काटने की सोची गयी सरकार ... आगे पढ़ें...
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लाख बुलाया, कितनी आवाज़े दी पर माना नही छत से उतर कर जीने पे बैठ गया आखिरकार कहता है बिना चाँद लिए उतरेगा नही कितना नादान है ये दिल मेरा! आगे पढ़ें...
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एक नज़्म,मुनासिब से कुछ अल्फाज़ ढूँढ रही है मुझे बयान करने के वास्तेकल सुबह से ही परेशान हैसही कोई लब्ज मिल नहीं रहाएहसास सारे खाली पड़े हैं देख लिए हैं उसने एक एक कर उलट-उलट कर रख रही है उन्हे सुना है, खाली चीजों को उलट कर रखते हैं नही तो, ख़ालीपन और ... आगे पढ़ें...
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उधेड़ गयी वो सीवन एक धागा था बांधे हुए गिरहें खोल दी उसने उसकी रिश्ते का हिज्जे बदल गया चेहरे का जायका भी, उसके साथ साथ बंद हो गयी सारी नसें आँसुओं वाली ना संभाल कर रखने को छोड़ाकोई निशान ना यादों के लिए कोई लकीर, जिसे कभी पकड़ के दुबारा लौटना हो सके एक ... आगे पढ़ें...
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