आँख में पकडी गयी चाँद के मैं कलसुबह वो पलके झुकाना भूल गया थावो आई तो मैने शाख बढ़ा दी अपनी वो छाओं थी इक, धूप की जो भर गयी आवाज़ उसकी, मेरे अल्फाज़ से मैने वहाँ से कुछ नज़मे निकाल ली किताब में पहले नदियाँ मिल जाती थी अब बादल बड़ी मुश्किल भींग पाते हैं ...
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