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  श्रेणियाँ > ग़जल  (7)

• तेरे जलबो में

तेरे जलबो में डूबता हूँ रोज तेरे जलबो की गहराई बहुत है. तेरे लम्हों का हाथ छूट गया जबसे मेरी दुनिया में तनहाई बहुत है. तुम मुड़ जाओगे ये मालूम था मुझको साथ चलने को तेरी यादों की पडछाई बहुत है तेरे कदमो में सर रखना है मुझे क्या करूं पर, तेरे कदमो की ऊँचाई ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: ग़जल
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• तुझे देखा है कई बार ख्वाब में

तुझे देखा है कई बार ख्वाब मेंसोचता हूँ कोई शेर लिखू तेरे किताब मेंबडी देर तक आंखे रही बेचैनजो छिपा लिया तुने चेहरा हिजाब मेंजाने कब तक लहरे रक्श करती रहीजाने किसने मिला दी समंदर शराब मेंतुमने तो खोल दी अनजाने ही में आंखो की धार कोतुम्हे क्या पता कौन बह ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: ग़जल
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• साकी... (2)

तू किनारे पे करना इंतेज़ार साकी मैं लौटूँगा फिर इस पार साकी बिक जाएंगे एक दिन कौडियो में सब तब भी बच जाएंगे ये बाजार साकी अरसे से महरूम रखा आँसुओं से आँखों का हूँ बड़ा मैं गुनहगार साकी तेरे घर का दरवाजा हर दफ़ा बंद मिला हम गुजरे तो तेरी गली से कई बार ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: ग़जल
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• साकी...(1)

वहीं पे है पडा अभी तक वो जाम साकीनिकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकीनजर में ठहरी हुई है वो तेरी महफिल अभी तकजो पी आया तेरे होठो से एक कलाम साकीहो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकीमुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: ग़जल
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• बडा इंतज़ार रहता है

दिल से चले गये दर्दो काजाने क्यो बडा इंतज़ार रहता हैऔर जो बच गये हैं बैठे हैं जाम लेकेहोश इनको जरा ना-गवार रहता हैआजकल अखबार का समाचार पढते वक़्तनजर बडा ही शर्मसार रहता हैबदन के रेशे रेशे पे जिंदा हर पलतेरे बोसे का प्यार रहता हैसमंदर ने छोड दिया आना साहिल ...   और पढ़ें...
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• में रहूँ

मुद्दत से आरजू है की तेरी चाँदनी में रहूँ. तुम छेड़ो कोई तार की मैं जिसकी रागिनी में रहूँहर तरफ तेरी लिखावट हो और, मैं तो बस सदा उसकी स्याही में रहूँकभी उठे लहर तो गिरे कभी फिर उठने के लिए, मैं हमेशा उसके पानी में रहूँ. खुदा के रहेम-ओ-करम तुम पर मुसलसल ...   और पढ़ें...
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• दिल को कोइ काम नही है

कहीं कोई मुककमल मोकां नही है जहाँ में कहीं भी चैन-ओ-आराम नही है. तुमने मसला उठाया है तो कह देता हूँ हम आशिकों से ज़्यादा कोई गुलफाम नही है. जिस साहिल के बदन पे समंदर अंगराईयाँ लेता है उस साहिल की भी कोई खुशनुमा शाम नही है आज फिर उनके जानिब से ना कोई पैगाम ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: ग़जल
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