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  श्रेणियाँ > थोड़ा सा आसमान  (50)

• वो आवाजें

मैं अपना नाम लेकरउसे आवाज देता रहाउसने मेरा नाम न अपने कानो पे रखाऔर ना ही लबो पे आने दियातडपती रही वो आवाजें मैं अनसुना ही रहा और वो अनकही ही   और पढ़ें...
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• लावा साँसे

छोटी सी इक छूअन धीमे से तुम्हारी उंगलियों में फँसाया था कभी वो भी ख्वाब में और कैसे धौंकनी हो गयी थी तुम्हारी साँसे पीछे दीवार से टिका कर तेरी पीठ मैने देनी चाही थी तुम्हें अपनी लावा साँसे याद है? पर तुमसे सहेजा ना गया था तुम अकबका कर चली गयी थी ख्वाब ...   और पढ़ें...
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• बाल्टी भर-भर जिंदगी फेंकी !

रात गर्म थी हवालू के थपेड़े उड़ रहे थे हर तरफ आंधी सा हाल था इतनी धूल उड़ी कि इंसानियत ने बंद कर ली आँखें अंधेरा कसा रहा चप्पे चप्पे पे. काले आसमान से एक तारा भी नही निकला जो टिम-टीमा दे जरा देर के लिए भी. सुबह सफाई वाले ने बाल्टी भर-भर जिंदगी फेंकी.   और पढ़ें...
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• इश्क में

रिश्ते घने हो जाते हैं जबकोहरे की तरह,तो इश्क हो जाते हैंतभी तो दिखाई नही देता कुछ भी इश्क में.   और पढ़ें...
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• कुछ कच्ची नज़्में

कच्ची रह गयी कुछ नज़्में इस बार भी आम के मौसम में अभी और बड़े होने थे पकने थे, और खूशबुएं आनी थी उनमे से पर तेज अंधर आए और झाड़ गये डालियां जिसके हाथ जो लगा वही लूट ले गया हर साल लूटी जाती हैं कुछ कच्ची नज़्में   और पढ़ें...
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• दोहरी तनहाई में

एक तो अपनी ...और दूसरी तुम्हारी...दोहरी तनहाई में जीता हूँ रोजशायद तुम भी जीती होगी कुछ इस तरह हीरोज शाम वे दोनो ही मिल जाती हैंसमंदर के साहिल के समानांतर बैठी हुईतुम्हे भी दिखाई दे ही जाती होगी कभी शायदवे रहती हैं सूरज डूबने तक वहींमैं लौट आता हूँ उन्हें ...   और पढ़ें...
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• जुम्बिश

तुझे देख कर ख्वाब में, रात सोया था मैं कल रातकल रात नींद आयी थी.आज जागने की तबीयत ही नही हुई गरम रहे तकिए, गद्दे और विस्तर सुबह तकगरम रहे मेरे कान पिघल कर बहती रही आरजुए देर तकतुझे देख कर ख्वाब मेंएक और वैसे ही ख्वाब के इंतिज़ार मेंजागा ही नही आज बडी देर ...   और पढ़ें...
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• बडे करीब हैं दिल के .....

बडे करीब हैं दिल के .....धान के खेतो के बगल से जाती हुई पगडंडीयाजहाँ छाव होती है मोड पे बरगद कीआम के बगीचे में खाट पडी हो कोईगरमी के दुपहरियो को मुंडेर से बंधे हो झुलेऔर ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल केक्यो नही होंगीये सारी चीजे पसंद जो थी तुम्हें   और पढ़ें...
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• तेरे बगैर अक्सर

शामें ढल जाया करती हैं तेरे बगैर अक्सर, अक्सर ही तेरे बगैर !जो ढल जाया करती हैं शामें तेरे बगैर मत पूछो कि उन शामो की रातों का क्या होता है कैसे नीली पड़ी रहती है उसकी देह जैसे कोई जख्म उभरते उभरते रह गया हो भीतर का दर्द बाहर न आ पाया हो जैसेजैसे बिस्तर ...   और पढ़ें...
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• अपने बिके देह में

आज फिर बेच दिए नींद की कतरने हमनेआज फिर बाजार की चढ़ती-उतरती दामो के साथ बाँध दिया खुद को. आज फिर अपने बिके देह में रहना होगा मुझे आज फिर रूह कर्ज से होकर गुज़रेगी   और पढ़ें...
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