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ब्लॉग्स (177)
रात गुज़रेगी आज अच्छी दिन गुजरा आज तेरे लफ़्जों के साथ बदन पे उगते रहेंगे गुलमोहर हथेली तेरी रहेगी जब तक इसके साथ देखा तो सीधा आँख से नीचे उतर गयी तेरी सूरत लिपटी थी इश्क के खयाल के साथ. सुबह काले घने गेशु में छिपी है रात आई थी घर कल अपने महबूब के साथ ... आगे पढ़ें...

लब्ज पसरे हुए हैं खाली कैनवास को महसूसते हुए रात भर इक नज्म क़ी मिट्टी कोडते रहे वो सारी रात सांस फंसी रही उनकी मिट्टी में ना कोई शक्ल बनी नज्म क़ी ना घुमड़ती तलाश को मिला कोई सुर्ख रंग बस लम्हा-लम्हा खाक होती गयी रात. उसे बस छिप कर चुप हो जाना था, सुर्ख ... आगे पढ़ें...

मकान पक्के होते गयेऔर दीवारे भीपक्के और सख्त साथ- साथदर्द सुनने के लिए न कान रह सके खुलेऔर न दिल के कोशे उनकेबारीक से बारीक पोर भीपाट दिए गयेगारे-चूने सेकंपकपाती निरीह कराहेंउन दीवारों के दोनों तरफ किसी कोलाहल का हिस्सा ही लगती रहींआसुओं से भींग करढह जाने ... आगे पढ़ें...

आज कुछ यूँ सलीके से शाम हुईदो नजरें, दो नजरों की गुलाम हुईंसात शब्द मिल नही पाए एक नज्म यूँ गुमनाम हुईअधुरा सा रुबरु रख गया थाऔर इंतिज़ार में जिंदगी तमाम हुईवही कागज है, और वही तकलीफहर्फ लाख बदलें, वही कलाम हुई आगे पढ़ें...

एक रिश्ता, जिसे बेहद खूबसूरती के साथ सिर्फ इक सोंच में तराशा गया,सिर्फ आरजुओं में समेटा गया एक रिश्ता, जो मिल गया था कभी यकायक किसी मोड़ पे या सीधे सपाट रास्ते पे कहीं और जो जाते वक़्त बाँध ले गया इक डोर से एक रिश्ता,जिसमेंएक जगह कभीबैठ नही पाई दो ... आगे पढ़ें...

आज अरसे बाद कैमरे में है भूख भूख पीटते हुए दिखाए जाए रहे हैं आंध्रा प्रदेश के एक गाँव में ओडिसा के भूख पुराने हो चुके अबबमों से मारे गये या बाढ़ से तबाह हुए लोग चैनल की टी आर पी रेट पर कुछ खास कमाल नही दिखा पा रहे थे सो भूख की फसल काटने की सोची गयी सरकार ... आगे पढ़ें...

लाख बुलाया, कितनी आवाज़े दी पर माना नही छत से उतर कर जीने पे बैठ गया आखिरकार कहता है बिना चाँद लिए उतरेगा नही कितना नादान है ये दिल मेरा! आगे पढ़ें...

एक नज़्म,मुनासिब से कुछ अल्फाज़ ढूँढ रही है मुझे बयान करने के वास्तेकल सुबह से ही परेशान हैसही कोई लब्ज मिल नहीं रहाएहसास सारे खाली पड़े हैं देख लिए हैं उसने एक एक कर उलट-उलट कर रख रही है उन्हे सुना है, खाली चीजों को उलट कर रखते हैं नही तो, ख़ालीपन और ... आगे पढ़ें...

उधेड़ गयी वो सीवन एक धागा था बांधे हुए गिरहें खोल दी उसने उसकी रिश्ते का हिज्जे बदल गया चेहरे का जायका भी, उसके साथ साथ बंद हो गयी सारी नसें आँसुओं वाली ना संभाल कर रखने को छोड़ाकोई निशान ना यादों के लिए कोई लकीर, जिसे कभी पकड़ के दुबारा लौटना हो सके एक ... आगे पढ़ें...

बहुत दिन हुए छुआ नही तेरी जुल्फों को संवारा नही उन्हे चेतना पे लदी थकान को तुम्हारी कश नही मिली एक अरसे से, धुएँ नही उड़ाए नींद में हीं उठता बैठता, चलता और सारे काम करता रहा भूलने लगा हूँ अब कि तेरी अंगराइयां जगाती हैं तो कैसा लगता है! हालांकि ख्वाब की ... आगे पढ़ें...

ढेर सारे अल्फाज घुमते फिर रहे हैं कमरे मेंपर बे-आवाज. हालाँकि ये वक्त वक्फ: का नहीं है आगे पढ़ें...

लकड़ियाँ जोड़ी ऊपले लगाए, तीलियाँ फूँकी केरोसिन भी डाला, पर ,आँच जली नहीनींद कच्ची ही रही. चाहिए थी एक पकी नींद दिन भर दौड़ में लगे रहे ख्वाबों कोआराम फरमाने के वास्तेपर, खयाल में कुत्ते रोते रहे और लाख लतियाने पे भी भागे नही सुबह चाय पीते हुए उनींदे मन ... आगे पढ़ें...

घर की अलगनी पे अंबार लगता जा रहा है एक के ऊपर एक गीली सोंचों का मैने खोल दिए हैं सारे दरवाजे, खिड़कियां और छत कोई भी गुंजाइश नही छोड़ी है किसी भी धूप के टुकड़े के लिए आसान है सोंचों को गीला छोड़ देना मगर फिर कितनी देर टिकी रहेगी अलगनी !! आगे पढ़ें...

वो बिखरती हुई सोंच थी, जिसे शब्द देकर समेटने की कोशिश में लगी रहती थी वो रात दिन उसे पता था, घर बंधा रहे इसके लिए सोंचों का बंधा रहना बहुत जरूरी है कई तरह के फ़ासले थे जोअपनी ताकत से बिखेर देते थे फिर-फिर उन सोंचों को जिन्हे वो शब्द देकर बांधती रहती थी उन ... आगे पढ़ें...

जिंदगी की कहानी, कुछ हट केथोड़ी अलग सी बनानी है. काट-छांट कर अलग करना है उन चीज़ो को जो फालतू जगह घेरे बैठी है जिंदगी के प्रस्तुतिकरण को भद्दा बनाती हैएक कहानी जो कोशिश करती हो, सिर्फ वकालत नही. लड़ती हो जरूरत पड्ने परमर भी जाती हो बिना ज्यादा परवाह किए, ... आगे पढ़ें...

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