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ब्लॉग्स (177)
बाहर आँगन मेंख्वाब गिर रहे हैं मैं अपनी खिड़की पे ठुढ्डि भिडायेदेख रहा हूँ कुछ बच्चों को चुनते हुए ख्वाबो कोऔर बंद मुठठी में ले कर वेजा रहे हैंशायद किसी गुललक में डालने के लिए यह क्रम जारी रहेगाऔर में देखता रहूँगाजब तक हूँ ... आगे पढ़ें...

वो गयीऔर अनजाने में हीलेती गयी अपनी आंखों से बाँध कर मेरे सपनेजब कभी अब वो खोल कर देखती है उन्हेरोती है आगे पढ़ें...

जाग के देखने के पहले हीवे नींद से जा चुके थेहमने तलाशी भी ली पर मिला नही वहांएक भी ख्वाबख्वाब नींद पे किसी नक्काशी की तरह थीजो वक्त के साथमिटती चली गईऔर साथ साथनींद भी ढहती चली गयी आगे पढ़ें...

ढूंढती है वोनींद की कतरनेअपने ख्वाबो मेंऔरकतरा कतरा नींद जोड़ करवो अपना एकख्वाब सीना चाहती है आगे पढ़ें...

जिंदगी अब यूँ है किसपनों के इंतिज़ार मेंनींदकभी इस करवटकभी उस करवट ... आगे पढ़ें...

वो वक्त कन्ही छूट गया है....वो वक्तजब पलको को जरा सा झुका करहम लपक लेते थेअनगिनत ख्वाबवो वक्तजब नींद के गलियारे मेंखेलते थे कित कित कभी वेऔर कभी पिट्टोतब सब कुछ ख्वाबो के वश में थावे सींचते थे हमारी आंखों को पानी सेऔर सवारते थेनींद कोतब आँख पर चढ़ कर ... आगे पढ़ें...

एक नींद सेदूसरे नींद तक की यात्रा मेंभटक गए हैं हमारे कुछ ख्वाबवे जो भटके हुए ख्वाब हैंउनके अक्सकभी दरवाजे के उस उस पार सेकभी खिडकी, कभी रोशनदान सेकभी हमारे चेहरो सेकही ना कहीं से वे लगातार झांकते रहते हैंवे दिखाई तो पड़ते हैंपर लाचारी ये हैकि उन्हे अब ... आगे पढ़ें...

एक असहाय क्रन्दन उस बच्चे की भाँति जो किसी मेले में गुम गया है या फिर जिसे छोड़ कर चली गयी है माँ उसकी, उसके देखते वो रो रही है वो रो रही है तुम्हारे अभाव मेंछाती में सांस पूर नही रहा वो रो रही है बुक्का फाड़ कार उसकी आँखें अब जार-जार... तार-तार... डर है ... आगे पढ़ें...

रात का काफी बडा हिस्सानूर की आगोश में जागता रहा समंदर साहिल पे आकरचहलकदमी करता रहाख्वाब बिजली के खंभों के नीचेबैठे ऊंघते रहेहर तरफ से वक़्त फिसल करगिरती रही तन्हाई के अंधे कुँए मेंमौन अपने हद तक चीख करबेअवाज हो गयी आखिरकारनींद नहीं आई कल रात भीकल रात ... आगे पढ़ें...

मेरे प्रेम पे वो ठहरता नहीमगर फिराक में रहता हैकि अपनी वासना सेपछाड़ता रहे मुझेअपने ताकत के तल्ले से,मसल देता है मुझेजैसे हीं उसके पीने क़ीतलब मिट जाती हैवो मुझे गोल-गोल घूमाता हैछल्ले से छल्ला निकालता हैमुझे धुआँ बनाकर,खेलने क़ी धुन में रहता है अक्सरवो ... आगे पढ़ें...

तुम अपनी जगह बिलकुल सही हो. तुम्हारा कहना बिलकुल सही, पर मेरे पास फुरसत इतनी सी है कि रुक कर थोडा हांफ सकूं अब तुम्ही बताओ कि कोशिश भी करून तो हांफते हुए कितना और कैसा प्यार किया जा सकता है!!! आगे पढ़ें...

ऐसा नही है के ये धुन्ध नया है ये धुन्ध तब भी था जब सुबह पाँच बजे मैं निकल जाता था ट्यूशन के लिए साइकिल पे जाडे के दिनों मेंये धुन्ध तब भी था जब मैं बाढवीं की परीक्षा में पहले निस्कासितऔर फिर बाद में अनुतीर्ण रह गया था ये धुन्ध तब भी था जब मैं एक उमरदराज़ ... आगे पढ़ें...

देखती रहती हूँ उसका रूप जैसे जाड़े में वो हो कोई धुप और सेंक कर सो जाना चाहती हूँ छु लेती हूँ उसकी देह इस तरह कि लगे यूँ हिन् अनजाने में छु गयी हो पता नहीं अपना स्पर्श देने के लिएया उसकी छुअन पाने लिए अपनी धडकनों कों उसके करीब ले जा कर छोडा है कई बार कि ... आगे पढ़ें...

तुम्हारे बहाव में बह जाने के लिए, मैं अक्सर जाता हूँ अपने किनारे से चलते हुए तुम्हारे मंझधार तक मैं खाली कर के हमेशा रखता हूँ कुछ स्थितियां ताकि तुम आओ तो उनमें कुछ भर सको उनमें वो जो कुछ पल हैं मेरे पास तुम्हारी ताप वाले उनमें जाकर स्थिर हो रहना मुझे ... आगे पढ़ें...

नही मालूम कहाँ से आ रहे हैं वे मगर उनकी रफ्तार बहुत तेज है और वे छा जाने की हैसियत रखते हैं हो सकता है वे वहाँ पहले से उपस्थित हों इतिहास के पन्नो में दबे हुए हमारी नज़रों के दायरे के बाहर या फिर हो सकता है वे चीखे हों पहले पर सन्नाटे के उपर नही पहुँचने ... आगे पढ़ें...

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