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ब्लॉग्स (87)
हालांकि, मैने छोड़ दिए हैं देखने वे ख्वाब पर, मेरे कंधे पर अभी भी आ टिकता है चेहरा तेरा और मेरे सीने को जब तब घेर लेती हैं बाजुएं तुम्हारी उन ख्वाबों मेंमेरी कनपटियो से छूती हुई अभी भी निकल जाती हैं तुम्हारी अलाव सी साँसे जो कभी ठंढी नही होती और जो फूंक ... और पढ़ें...

वो सूखा खड़ा था वहाँ, जब दुबारा आगोश में भरा था उसने फिर उसी पुरजोर कशिश के साथ. कुछ बरस पहले वो हरा था और ऐसी घनी छाँव थी उसकी कि गुजरते हुए कोई भी रूक जाता था वहाँ फिर छूटती गयी थी हरियाली गिरती गयी थी पत्तियाँ एक एक कर.उसने बाहें ढीली कर दिन थी दरअसल. ... और पढ़ें...

जरा सा रह गया है नदियों में पानी उसी के लिए चल रही है मारा-मारी .जरा सी रह गयी है पुरानी घनी छाँवउनपे भी जल्दी हीं चलने वाली है कुल्हाड़ी जरा सी रह गयी है फ़िज़ा में नरम, ताजी हवा जो सबसे तेज दौड़ पाएंगे वही सांस ले पाएंगे. जरा सी बच गयी है मौसमों में ... और पढ़ें...

जैसे आप खो गये हों कहीं मान लो, किसी अनजाने ग्रह पे आप सा वहाँ कोई नही आपकी आवाज़ कोई पहचानता नही आपकी बोली में कोई बोलता नही कोई अपना सा खोजते खोजते आपका दम टूटने लगा हो पुकारते पुकारते आपके कंठ सूख रहे हो और आप बदहवास से भागते हुए ढूंढ रहें हो इधर-उधर ... और पढ़ें...

एक अधूरी नज्म है. बाल्कनी में चहलकदमी करती हुई. खंगालती हुई कुछ पुराने मौसम. दिमाग की नसें छेड़ती हुई वो गुजर रही हैं अनजान राहों से जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं भनभनाते हुए दिमाग मेंजो हटाये नही हटतेऔर डांटने पे मुँह फुला के बैठ जाते हैं मैं जोडता ... और पढ़ें...

एक अधूरी नज्म है. बाल्कनी में चहलकदमी करती हुई. खंगालती हुई कुछ पुरानी ऋतुएं. दिमाग की नसें छेड़ती हुई वो गुजर रही हैं अनजान राहों से जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं सिगरेट की धुएँ से जो छिड़ जाते हैं. मैं जोड़ता हूँ, तोड़ता हूँ, निकालता हूँ, मिलाता ... और पढ़ें...

रूह के साथजरा सा भी रोमांसजारी नही है अब.जाने कैसेदेह की मांगे बढती हुईयहाँ तक पहूंच गयीकि सारी रूह मिट गयीपूर्ति में ही.ना प्रार्थना साफ रहीना प्रेम सफेदऔर ना ध्यान शांत हर तरफ आवाजें हैं बाजार कीऔर चीजेंजिसमें से छांटो तो जरा सा सूकून भी नही निकलता.किस ... और पढ़ें...

धूप में पड़े रहे वो.पह्ले रंग उतरे उनकेऔर फिर धीरे - धीरे उनकी चिद्दिया उड़ती चली गयी छाव खींच कर वेआशियाना बना लिये होते, गरएक ने दूसरे की जिद मान ली होतीमगर वे अड़े रहेन छाव खींची, न जिद अपनीपड़े रहे वे धूप में चिद्दिया उड़ने तक.जाने क्यू, जाने कैसे! और पढ़ें...

समय घिस-घिस कर फटता रहाऔर हम उनपे पैबंद लगाते रहेकुछ यूँ ही गुजरी जिंदगी हमारीहालात तो हमने ढक दिये पैबंदो सेपर पैबंदो को हम नही ढक पाये. और पढ़ें...

मैं अपना नाम लेकरउसे आवाज देता रहाउसने मेरा नाम न अपने कानो पे रखाऔर ना ही लबो पे आने दियातडपती रही वो आवाजें मैं अनसुना ही रहा और वो अनकही ही और पढ़ें...

इस लड़खड़ाती रात मेंउसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँउसकी यादों का जिंदा वजूदमेरे हर गिरते पल को थाम लेता हैयाद में ये राहें इतनी व्यस्त नही हैंवहाँ प्यार से चलने के लिये जगह भी है और वक़्त भीउन पर जरा बेफिक्र हो कर चला जा सकता हैयाद में उसकी लबे हैं ... और पढ़ें...

तेरे जलबो में डूबता हूँ रोज तेरे जलबो की गहराई बहुत है. तेरे लम्हों का हाथ छूट गया जबसे मेरी दुनिया में तनहाई बहुत है. तुम मुड़ जाओगे ये मालूम था मुझको साथ चलने को तेरी यादों की पडछाई बहुत है तेरे कदमो में सर रखना है मुझे क्या करूं पर, तेरे कदमो की ऊँचाई ... और पढ़ें...

छोटी सी इक छूअन धीमे से तुम्हारी उंगलियों में फँसाया था कभी वो भी ख्वाब में और कैसे धौंकनी हो गयी थी तुम्हारी साँसे पीछे दीवार से टिका कर तेरी पीठ मैने देनी चाही थी तुम्हें अपनी लावा साँसे याद है? पर तुमसे सहेजा ना गया था तुम अकबका कर चली गयी थी ख्वाब ... और पढ़ें...

रात गर्म थी हवालू के थपेड़े उड़ रहे थे हर तरफ आंधी सा हाल था इतनी धूल उड़ी कि इंसानियत ने बंद कर ली आँखें अंधेरा कसा रहा चप्पे चप्पे पे. काले आसमान से एक तारा भी नही निकला जो टिम-टीमा दे जरा देर के लिए भी. सुबह सफाई वाले ने बाल्टी भर-भर जिंदगी फेंकी. और पढ़ें...

हमने अपने दिल ही नही कुरेदे. ये सोंच कर कि हवा, पानी, रोशनी रोक ली जाएगी, बीज हमने दबाए ही नही माटी में और रोक दी सम्भावना किसी खूबसूरत रचना की. तब ख्वाब में उगे वे बीज वहाँ वे खिले,लहलहाए और मुस्कुराये खूब खुशबूएं बिखेरीवे बाहर भी आयी उनके पोरों से बाहर ... और पढ़ें...

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