कहीं से भी, कभी भीचली आती है वो औरपालथी मार कर बैठ जाती हैघड़ी की सुइओं परवक्त कुछ देर तक दमघोंटू गले सेटिक टिक करता रहता हैऔर फ़िर बंद हो जाता है आखिरकारखूब सारा समय इकठ्ठा हो जाता हैखत्म नही होते दिनलाख भटकने पे भीऔर रात भी मुंदी पलकों के नीचे जागती रहती ... आगे पढ़ें...
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चाँद ने,लगाई बिंदी माथे पेओढे गहने और कपड़ेमेंहदी लगे हाथो में पहने कंगनमन पे, पहले का सारा पहना हुआउतार दियाऔर सूरज की लपटों के सात फेरे ले लिएखामोश लबों पे उठती हुई टीसऔर कंठ में रुकी हुई हूकअनसुनी कर दी गई थी पहले हींबहरा आसमान ! आगे पढ़ें...
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जहाँ से भी मिलाजिस भी बदन सेउठा के लाद लिया अपने बदन पेअब ठीक से याद भी नहीकहाँ से उठायाकिस बदन से कबइकठ्ठा करता रहा,आलमारी और रैक भर गए जबतो दीवान खरीद लियाअब उनके ऊपर हीं सोता हूं।आज की तारीख मेंये तय करना मुमकिन नही किकौन सा जख्म तो अपने बदन का है और ... आगे पढ़ें...
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दुःख पे पाँव अगर पड़ जाएतो दुख बिदक कर काट लेते हैं ।नज्में सब पीलीं पड़ गई हैंजाने कब की ये किताब है।तुम्हारे मन में उमस है, इसलिएमुझ तक आने के रास्ते सारे चिपचिपे।अब बस मैं एक रूह हूँजीने के लिए बदन उतारने पड़े।हमने अपना एक जिस्म बनाया हैअब बस एक रूह की ... आगे पढ़ें...
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बहुत तेज सन्नाटा है !सारी आवाजों को दबाए बैठा हैकिसी बर्बर तानाशाह की तरहहोंठ के भीतर हीं ,ये आवाजें,गले के ठीक नीचे तक भरीकोई फडफडा रही है , कोई बौखला रही है ,कोई घुमड़ रही है किसी गुबार की तरहकोई थक के शांत बैठ गई हैये दबी हुई आवाजें,जिनका कि शक्ल अब ... आगे पढ़ें...
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लब्ज सुन लिए गए थे ...कायनात की सारी आवाजों नेउन तीन लब्जों के लिएसारी जगहें खाली कर दी थीहोंठों पे सदियों से जमा वजनउतर गया थाउसके भीतर कोई नाच उठा थाजो नाचता हीं जा रहा था लगातारलगातार... आगे पढ़ें...
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एक मुश्त देखा नही तुझे कभी भीबस किश्तों में देखा हैथोड़ा-थोडाठीक से याद भी नहीकब-कब औरकहाँ-कहाँपर तेरा चेहरा याद्याश्त के चप्पे-चप्पे पे हैतुम्हारा चेहरा कहीं से भी झांक जाता है ...जैसे सफर के दौरानबस या ट्रेन की खिड़की से,बगीचे में पानी डालते समय फूल ... आगे पढ़ें...
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(After watching a long column of second marriage in matromonial of a newspaper) दिल और दिमागदोनों भिड़ा कर बंद कर दिएऔर सांकल चढा ली अन्दर सेअब न सुनने को बचा था कुछऔर ना हीं आजमाने कोहर तरफ़ से दीवार ढह करबह गई थी पानी मेंदेर तक बैठी रही,यादों और यादयास्त ... आगे पढ़ें...
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मैं सोंचता हूँ कि जैसी मंदी का दौर है और नौकरियां जा रही हैं वैसे हीं अगर हमारी रूहों के हाथों से बदन छूट जाएँ और फ़िर मिलने में मुश्किल हो )तुम अलावा हो !अभी तुम्हारी जरूरत नही,तुम्हारे लिए अभी कोई आरजू नही है खाली.अभी सारे देह हैं भरे हुएऔर अभी आने वाली ... आगे पढ़ें...
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Lets overlap each otherLets encroach also!Lets sprout togetherLets blossom also!Lets dream togetherLets wake up also!Lets put some glassesLets bring wine also!Lets break the painLets repair also!Lets enjoy the dayCheers also!Come on!everybody!!! Say to ... आगे पढ़ें...
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संकरी होती गयी ये गलियाँघरों को लांघती हुईगलियों तक आ गयी ख्वाहिशें,अतिक्रमण करते हुए.और फिर गलियों से सड़कों तक.ख्वाहिशों का जामआए दिन सुर्ख़ियों में रहता है...जैसे धमनियों की अंदरूनी दीवारों पेवसा की परतेंजम करलहू के दबाब को बढ़ा देती हैमाफिक उसके हींये ... आगे पढ़ें...
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हरेक क्षण कोधकिया करकाबिज हो जाता हैउसकी जगह परएक दूसरा क्षणक्षण भर के लिएहैं कितनी लडाईयाँहै कितना द्वेषकितने झूठकितनी घोषनाएं , गर्जनाएंऔर फिर अंत मेंवही मृत्यु आगे पढ़ें...
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यहाँ से सात योजन दूर मेरी कोई मिट्टी रहती है और मैं सात योजन दूर बिना मिट्टी के रहता हूँ सात बरस हुए सात लंबे बरस सात जाड़े, सात गर्मी और सात बारिश सात होली-दीवाली सात रोपाई, बुआई और कटायी सरसो के फूलने और आम के मांजराने के मौसम सात, सात मौसम बारातों के ... आगे पढ़ें...
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मैं अक्सर सोंचता हूँ अपनी पीठ को तुमसे जोड़ कर खास कर पीठ के उस हिस्से को जहाँ मेरी बाजुएँ पहुँच नही पाती मैं अक्सर सोंचता हूँ किसर्दियों के एक इतवार को छत पे मैं लेटा हूँ और तुम पीठ पे तेल मल रही हो या फिर कभी नहाते समय आ गयी हो बिना बुलाये पीठ पे ... आगे पढ़ें...
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ढीले नही हुए कसावअलग होकर भीशाम उदास नही हैतनहा होकर भीनज्म अपने वजूद में जिन्दा हैलफ्ज खोकर भीथमी नही है मौतखा कर ठोकर भीबीज अंकुराया हैपत्थर से होकर भीमुझे पहुंचना है वहांताउम्र चलकर भीकुछ भी नही हुआसब कुछ होकर भीतू मेरी ही हुईउसकी होकर भी आगे पढ़ें...
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