कुछ गुनगुनी धूप वाले मौसम होते हैं जो पसर जाते हैं जिंदगी की अलगनी पर कुछ इस तरह जैसे कि वे सारा पतझर ढांप लेंगें. तमाम उगे हुए दर्द और सुखी हुई तन्हाईयाँ गिरा कर वो भर देते हैं नंगी शाखों को कोंपलों से.कोयल कूकती है, पपिहे गाते हैंऔर योवन दुबारा पनपने ... आगे पढ़ें...
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कहीं कोई मुककमल मोकां नही है जहाँ में कहीं भी चैन-ओ-आराम नही है. तुमने मसला उठाया है तो कह देता हूँ हम आशिकों से ज़्यादा कोई गुलफाम नही है. जिस साहिल के बदन पे समंदर अंगराईयाँ लेता है उस साहिल की भी कोई खुशनुमा शाम नही है आज फिर उनके जानिब से ना कोई पैगाम ... आगे पढ़ें...
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पतझर में जो पत्ते बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से, वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं उन सूखे पत्तों की रूहें उसी आशियाने की दीवारों पे सीलन की तरह बहती रहती है किसी भी मौसम में ये दीवारें सूखती नही ये नम बनी रहती है मौसम रिश्तों की रूहों को सूखा नही सकते. आगे पढ़ें...
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सुबह पर धूप ने अभी अभी चादर लपेटी है. दूब पर बैठे ओस के परिंदे अपने पर फैलाने लगे हैं. ख्वाब भी नींद की आरामगाह से निकल कर अपने-अपने तलाश में निकल करसड़कों पे दौड़ने लगे हैं. अपनी अपनी गति से, अपनी अपनी उम्मीद और धुन में, अपने अपने पेट्रोल के सहारे. एक ... आगे पढ़ें...
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कुछ स्वर,जो लब्जों के पनाह में जगह नही पातेउनखामोश स्वरों की रूहें सदियों तक,इंतिज़ार करती हैं की शायद कभी कोई आवाज़,कोई लब्ज उसे अपना जिस्म पहना दे और उन कानों तक पहुँचा देजिनके लिए उन्हे मौन में छोड़ा गया थास्वर मरते नही वे कहीं छूट जाते हैंमौन और लब्ज ... आगे पढ़ें...
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दुनिया किसी किनारे पे खत्म नही होती ऐसा कहते हैं खोज के परिणाम. मैं ज्यादा दूर गया नही हूँ अभी किनारे की ओर पर कहाँ जाया जाता है मुझे नही पता जब दुनिया बीच में हीं खत्म हो जाती है पृथ्वी अपनी धूरी पे नही घूमती दुनिया में मौसम नही बदलते पतझर अटका हुआ रहता ... आगे पढ़ें...
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तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में तुम हमेशा मुस्कुराती रहती हो वहाँ तुम्हारी मुस्कान, जिसे मैने अभी लाख चाहा शब्दों में उतरने की पर रहा नाकाम, आँखों के पानी में हरकत करती रहती है हमेशा ये अच्छा है की कुछ ... आगे पढ़ें...
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रात को अलाव में काटा है नींद आँखों में गिरती हीं नहीं. साहिल पे गया था कल शाम को रेत पे तेरा नाम लिख के आया था. एक सुकून है तेरे नाम में याद करता हूँ तो सांस आती है. रिश्ते टूट कार अलग हो जाते हैं तो शायद दो रिश्ते बन जाते हैं. जो आशियाना हम नही बना सके ... आगे पढ़ें...
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इनकार करती हैं तेरी यादें फींकी पड़ने से .दर्ज करती हैं ये हर रात मेरे ख्वाबों पे अपना बोसा .जिंदा करती हैं खामोशियों को ये लबेन तेरी मेरे लबों पे गुलाब रखती हैं. मैं इस पल में हूँ और ये बीती रैना पर ये ज़्यादा जिंदा हैं .तेरी ठहरी आवाज़ों पे कान रख के ... आगे पढ़ें...
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बातें आती हैं जाती हैं पर खत्म नही होतींढूँढती रहती है अफ़सानों में अपनी जगहखोलती रहती हैं पुरानी सन्दुकेन यादों की पुरानी जंग लगी तहें.बातें दूर तक साथ जाती हैंगर उन्हें किसी नम रसीले गले का सहारा मिल जाता हैगर किसी अहसास के साथ उन्हें किसी अफ़साने में ... आगे पढ़ें...
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उनकी छुअन अब नही लगतीं वे खाली-खाली से रह गये मौसम हैं पेड़ो पे लद भी जाएँ तो शाखें नही झुकतीं वो जो धरती के सबसे नायाब मौसम थे, वो भरे-पुर महकते मौसम फ़िज़ाओं से जाने कैसे गायब होते गये. अब ना तो उनके स्पर्श घुमड़ते हैं आसमान में और, ना हीं उनकी बूंदे ... आगे पढ़ें...
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एक टुकड़ा शब्द लहू-लुहान तड़फर्ता रहा देर तक और दम तोड़ दिया आखिर. सारे आवाज़ एक बार फिर तोड़ दिए थे फर्श पे पटक के उसने. सन्नाटा दीवार के कानो पे बर्फ हो गया था और जिंदा बचे अल्फाज़ पूरी ताकत से अपनी कंपकंपी संभाल रहे थे. ऐसा हीं हो जाया करता था अक्सर. ... आगे पढ़ें...
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