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ब्लॉग्स (102)
हम साथ साथ नही भाग पायेबचपन मेंटिकोले लुटने या अमरूद तोडने के वास्तेना हमने आपस में मार- पीट कीकभी पतंग के लियेना छीना झपटी कभीवो मुझसे पांच साल बडा थाऔर वक्त के अंतर नेहमारी प्राथमिकताये अलग कर दी थीजब मैं अमरूद के पेंडो के इर्द्- गिर्द घूम रहा थावो शायद ... आगे पढ़ें...

ऊग आयी है फसलबीज जो संकुचित था अपने खोल मेंफूट कर बाहर आ गया हैएक नयी आशा जगाता हुआमाटी आज अहोभाव से भरीताक रही हैसूरज के तरफसूरज भी अपने जलन का मुल्य पा चुका हैअपना जला कर भीअपना गला कर भीकुछ पैदा कर देता है कोइ जबतोकितनी तसल्ली होती है. आगे पढ़ें...

मुझे उतार दिया जाएगा कुछ देर में हीं चढ़ते जा रहे बाजार की नजर से‘सेल में लगी पुराने उत्पादों के बीच डाल दिया गया है मुझे जिन्हे आने वाले उत्तेजक आइटमों के खातिर जगह बनाने के लिए औने पौने दामों में खपा देने की होड़ मची है. आगे पढ़ें...

भूख थे वहाँ कतार में खड़े और पेट उनके, आग में पक रहे थे चेहरे पहले लार लार हुएफिर सूख कर लटक गयेइंतेज़ार में, जीभ पपड़ीदार हुए फिरआस में भोजन केमगर शर्म नही आयी उसे.वो भीतर आसन पे विराजमान अपनेदप-दप करते चेहरे के साथ मजे से चढ़ावे खाता रहा. आगे पढ़ें...

दिल से जो चले गये, उन दर्दों के लिए,जाने क्यूँ कभी-कभीदिल बड़ा बेकरार रहता है और जो गये नही अब तकवो बैठे हैं जाम लेके होश उनको जरानागवार रहता है.कुछ ऐसे भी दर्द हैंजो पड़े हैं बरसों से,पत्ते खेलने के लिए जिन्हें, शाम कोकुछ और दर्दों का इंतिज़ार रहता ... आगे पढ़ें...

नींद औंधा पड़ा है रजाई में सिकुड़ कर, बाहर, आंगन में नींद से बिछुड़े हुए ख्वाब टूट-टूट कर गिर रहे हैं निहायत बेकार सा कोई वक़्त अपने टखने में दर्द लिए चल रहा है. ऐसे मेंतुम्हारेहाथों से एक कप चाय हो जाये अगर... आगे पढ़ें...

जीवन के सारे स्वाद हो चुके हैं नीम, मीठे स्वाद की याद बच नही पाएगी अब और ज्यादा देर. साँसों की यात्रा में दूर दूर तक फैला हुआ कोलतार है दममें की उठा पटक है धुआँ है, गुबार है भयाक्रांत है बची हुई थोड़ी सी पारदर्शी हवा हम, तुम, सब जानते हैं हवा, पानी और ... आगे पढ़ें...

अभी से शायद कुछ देर पहले हीं उसने अपनी हीं बनाई दुनिया को बेसहारा कर दिया और ये दुनिया चरमरा कर गिरने लगी. अहं का ये कैसा घिनौना प्रदर्शन कि हमारे कान टूटने के शोर से भर गये !!!मैं उसका विरोध करता हूँ क्यों कि वो जब-तब हाथ खींचता रहता हैअपनी हीं बनाई ... आगे पढ़ें...

वो कुछ हाथ थे, जो निकल गये हाथ से वो कुछ हाथ थे मैं चाहता हूँ कि, जो मेरा कंधा ले लें फिर से अपने घेरे में. वो कुछ हाथ थे जो अक्सर, स्कूल जाते वक़्त कंधे घेर कर लटक जाते थे दूसरी तरफ वे कुछ हाथ थे जो लगभग रोज बाँट लेते थे चाट और पानी-पूड़ी, अमरूद और ... आगे पढ़ें...

वो रिश्ते जिनके बीज ख्वाब में गिर कर हीं रह गये मेरी माटी नही छू पाए उन रिश्तों की पौध ऊग आई है आज मेरे सूने आंगन के एक कोने में मैं हाथ नही लगाता उनकी पाकीज़ा कोंपलों पे, डरता हूँ, अपने हक के बारे में सोंच कर. सिर्फ सुनने की कोशिश करता हूँ उन्हे हाथ में ... आगे पढ़ें...

यूँ हीं नहीयूँ हीं तो नही कभी भी कभी बैठा नही यूँ हीं और कभी चला भी नही सब कुछ किया मकसद से हमेशा चला उधर, जिधर लगा कि मंजिल है भागता रहा ख्वाब ख्वाब, परवाह नही की ख़ुरदुरी जमीन और ऊबड़ खाबड़ रास्तों की, सब तय किया जैसा भी जरूरी लगा उस वक़्त याद नही रखा- ... आगे पढ़ें...

मैं कृतग्य हूँ मैं कृतग्या हूँ उस जीवन के प्रति जो मुझमें और तमाम अन्य जीवों में लगातार साँसें ले रहा है मैं कृतग्य हूँ उस सूरज के प्रति जिसने ऊर्जा भेजने में कभी कोई चूक नही की और जिसके बिना अकल्पनीय थी हमारी सर्जना मैं कृतग्य हूँ उस प्रकृति के प्रति ... आगे पढ़ें...

तुम अपना सिर टिकाओ तो सही देखो, मैं अपना कंधा बढ़ा चुका हूँ. देखो जरा गौर से, मेरे शरीर का रोम-रोम तुम्हारे दर्द सोखने को तैयार खडे हैं. तुम अपना हाथ मेरे हाथों में रख दो, मेरा वादा है तुम्हारी लड़खड़ाहट को अपनी कदमों पे ले लूँगा हाँ, दे ही दो तुम मुझे ... आगे पढ़ें...

शहर या तो अलग अलग क़तारों में ख़ड़ा है बंटा हुआ, याफिर उपस्थित हैदौड़ता हुआ भागदौड़ क़ी परिधि पे, अपनी पूरी थकान के बाबजूद शहर को मैने कभी फुरसत में नही देखा ना हीं कभी एकजुट. बहुत बड़ी-बड़ी कतारें उपस्थित हैं बहुत छोटी-छोटी जगहों में जगह के बीच से जगह ... आगे पढ़ें...

एक डगमगाता हुआ विश्वास गिर कर टूट जाने के लिए है एक दम बेताब एक उबलती हुई सनसनी फैल जाने के लिए है एक दम तैयार छोटी छोटी नाकामियों पर एक क्रोध हर समय आपे से बाहर होता हुआ जैसे बैठा हो गेहूंवन कि लिबलीबी पर दया, प्रेम, करुण और मुस्कान सब सतही, नियत और ... आगे पढ़ें...

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