शहर, पुराने बाशिंदे, माएं और पिता
शहर अपने पुराने बाशिंदों को पुराने पोलीबैगों में भरकर कुडेदानों में फेंक आया है वे मिल जाते हैं कभी ...
Om Arya द्वारा 11 मई, 2009 11:10:00 PM IST पर पोस्टेड
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जुगलबंदी
तुम्हारी जुगलबंदी में अक्सर बन जाती है कोई धुन तुम्हारे साथ होना मध्य रात्रि से थोड़ा पहले, जब सारे ...
Om Arya द्वारा 24 फ़रवरी, 2009 8:28:00 AM IST पर पोस्टेड
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मुझे तुझमे थोडी देर और रुकना था
मुझे तुझमे थोडी देर और रुकना था जिस्म से रूह पर अभी फिसला ही था अभी देखा भी नही था उसे आंख भर कि ...
Om Arya द्वारा 3 जुलाई, 2008 8:51:00 AM IST पर पोस्टेड
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कितनी देर टिकी रहेगी अलगनी !!
घर की अलगनी पे अंबार लगता जा रहा है एक के ऊपर एक गीली सोंचों का मैने खोल दिए हैं सारे दरवाजे, ...
Om Arya द्वारा 29 अगस्त, 2008 4:10:00 PM IST पर पोस्टेड
पतझड़ और सीलन
पतझर में जो पत्ते बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से, वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं उन सूखे पत्तों ...
Om Arya द्वारा 6 फ़रवरी, 2008 5:24:00 PM IST पर पोस्टेड
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ढीले नही हुए कसाव
ढीले नही हुए कसाव अलग होकर भी शाम उदास नही है तनहा होकर भी नज्म अपने वजूद में जिन्दा है लफ्ज खोकर ...
Om Arya द्वारा 21 जनवरी, 2009 9:37:00 PM IST पर पोस्टेड
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ख्याल टूटे हुए से
दुःख पे पाँव अगर पड़ जाए तो दुख बिदक कर काट लेते हैं । नज्में सब पीलीं पड़ गई हैं जाने कब की ये किताब ...
Om Arya द्वारा 7 फ़रवरी, 2009 8:03:00 AM IST पर पोस्टेड
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नींद से बिछड़ा हूँ मैं
एक नींद से बिछड़ा हूँ मैं एक ख्वाब का टुकड़ा हूँ मैं चील सी उड़ती हवाएँ धूप जैसे चोट खाये कुछ ...
Om Arya द्वारा 16 फ़रवरी, 2008 3:23:00 PM IST पर पोस्टेड
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