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जब भी कुछ छूटता है


कभी भी कुछ छूटता है
तो तेरे छूट जाने जैसा हीं लगता है

चीजों का छूटना
दरअसल
छूटने के उसी एक मंजर से आज भी बाविस्ता हैं

उस बार की तरह
हर बार गला बुक्का फाड़ती है
आँख बहती है
और सीना फटता सा है

पर अजीब है ये कि
चीजें आज भी छूटती हैं
रुकने और रोकने,
बंधने और बाँधने
और इस तरह के तमाम यत्न के बावजूद ,
जैसे कि तय रहा हो उनका छूटना
उनका छूट जाना आज भी होता है

मिलने के बारे में भी
वैसा कहा जाना जरूरी है
जैसा कि छूटने के बारे में कहा गया कि
तय होता है मिलना भी
दरअसल
यह मान लेना तकलीफ कम कर देता है
कि मिलना छूटने के प्रक्रिया की शुरुआत भर है
और छूटने की तकलीफ के बारे में कहते समय
मिलने की खुशी को उसमें से घटा देना जरूरी है

कभी यूँ भी होता है कि
हम जोड़ते हैं कुछ ऐसी चीजें
जिनके बारे में हम जानते होते है
कि वे छूटेंगी
पर हम छोड़ नही पाते जोड़ना

फ़िर कई बार अनजाने हीं में
जुड़ जाती है चीजें
और कई बार हम जानते हुए जोड़ते हैं
पर सभी स्थितियों में
तकलीफ एक सी हीं होती है
जब जुड़ी हुई कोई चीज छूटती है

पर मेरा कहना ये है कि
सिर्फ़ छूट जाने से होने वाली तकलीफ के कारण
हमें जुड़ना और जोड़ते रहना छोड़ना नही चाहिए
क्यूंकि यह तकलीफ उस तकलीफ से
छोटी होती है जो
कभी नही जुड़ने या जोड़ पाने पैदा होती है

प्रतिक्रियाएँ

Re: जब भी कुछ छूटता है
सिर्फ़ छूट जाने से होने वाली तकलीफ के कारण हमें जुड़ना और जोड़ते रहना छोड़ना नही चाहिए nice ..
अस्वीकरण