तीन साल हुए
जब वो चली गई थी
आज भी नींद में
मेरे हाथ उसको बिस्तर पे खोजते हैं
और टटोलते हुए
उसे न पाकर
जाग जाते हैं
अपने सपनो में
कई बार पा भी लेता हूँ उसे
पर मेरे जागने से पहले
हर बार
वो उठ कर चली गई होती है
उसके पास वो बाहें थी
जो मुझे घेर लेती थीं सोते वक्त
और स्पर्श
जिसे वो मेरी उँगलियों में फंसा देती थी
मेरे उदास क्षणों में
मेरी यात्राओं में
अब उदासी उपजती है जब भी
उन उँगलियों की अनुपस्थिति मुझे
और कर देती है उदास
और रातों को मैं बार बार गिरता हूं
उसके घेरे के बिना
मृत्यु में
और वहां से ख़ुद हीं उठ कर आना पड़ता है मुझे
अभी तो सिर्फ़ तीन साल हीं बीते हैं
जाने कितने साल और
मुझे यूँ हीं गिरते रहना पड़ेगा मृत्यु में
और जीते रहना पड़ेगा
उजाड़ और उदासी के साथ.
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