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तुम नही हो अब यहाँ!


तुम नही हो अब यहाँ

जहाँ तक पहुँचते हैं मेरे हाथ
वहां तक नही हो तुम

बस तुम्हारा अभाव है
यहाँ वहाँ बिखरा हुआ

तुम्हारे अभावजनित दुःख में
मुझे रोना है
फूट-फूट कर
तुम्हारे छाती में सर घुसा कर
किसी छिरियाये हुए बच्चे की भांति
अपना हाथ-पाँव-माथा पटकते हुए

अपनी पूरी ताकत से
उडेलना है दुखों को बाहर

पर तुम नही हो यहाँ अब
तुम्हारी छाती भी नही
बस तुम्हारा अभाव है
जो रोने के लिए
एक तीव्र दुःख सृजित करता है ।

प्रतिक्रियाएँ

Re: तुम नही हो अब यहाँ!
बहुत ही संवेदन शील कविता।
अस्वीकरण