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दुविधा


किससे मिलूं
और किससे छिप कर निकल जाऊं
कि मिलने पर
कौन मुस्कुराएगा एक सच्ची मुस्कान

किससे खुलूं
और किससे नही
कि खुलने पर
कौन नही उठाएगा
फायदा मेरे कमजोरियों का

किसे दूँ उंगली
और किसे हाथ
कि हाथ बढ़ाने पर
कौन नही चाहेगा मेरे पहुँचा पकड़ना

क्या करूँ मैं

क्या वास्ता रखने के लिए
रखूं सिर्फ़ वास्ता
और शामिल हो जाऊं
उन्ही लोगों के भीड़ में
जो संशय और सवाल दोनों
एक साथ पैदा करते हैं

या फ़िर
इसी तरह जीता रहूँ
संशय और सवाल के बीच
ख़ुद को धकेलते हुए

प्रतिक्रियाएँ

Re: दुविधा
किससे मिलूं और किससे छिप कर निकल जाऊं कि मिलने पर कौन मुस्कुराएगा एक सच्ची मुस्कान aaj wo her insan ki khwaahisha bankar rah gayee hai ye panktiyan jo jeewan ko bahut karib se dekha hai.
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