जितनी बनाई मैंने
वे सब टूटी
कुछ वजह से,कुछ बेवजह भी
फ़िर उन्हें जोड़ा भी
जो टूट गयीं थीं
कुछ जुड़ीं भी, कुछ नही भी
जो जुड़ीं
वे फ़िर से भी टूटीं
उनके अलावा वो भी टूटीं
जो मैंने नही बनाई
पर जो अपने आप बनी हुई थीं पहले से हीं
आज की तारीख में
कुल जमा एक भी नही है
जो टूटी नही हो
एक बार भी
और
मैं अपने बदन पे
न जाने कितनी गांठें लिए
जी रहा हूँ.
लोड हो रहा है...