तुम्हारी जुगलबंदी में
अक्सर बन जाती है कोई धुन
तुम्हारे साथ होना
मध्य रात्रि से थोड़ा पहले,
जब सारे स्वर शांत हो गए होते हैं,
राग मालकौंस के साथ होने जैसा है
तुम्हारे विशाल आगोश में
एक मुलायम धुन बहती है
और उसपे बहता है मेरा नाजुक सा एक ख्याल
तुम्हें जब से सुना है
तब से ,
तुम्हें छोड़ कर
कुछ भी सुनना व्यर्थ लगता है
तुम्ही तो हो सबकुछ मेरे अब
ओ मेरी तन्हाई
मेरे अकेलेपन , खालीपन
मेरा सन्नाटा।
आओ अपनी बाजुओं में फ़िर से ले लो मुझे
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