शाम के इस भूरे बदन से
आ-आकर टकरा रही हैं बार-बार
पूरी गति से,
कई तरह के रेतीले भावों से सनी।
मटियामेट कर रही हैं एक के बाद एक, सारी ख्वाहिशें
आज नही रुकेंगी ये लहरें ....
अभी से कुछ देर पहले हीं
वो पोत गया है
डूबते सूरज के चेहरे पे बहुत सारा मटमैला बादल
तोड़ कर बंधन,
छोड़ कर बरसों से थामा हुआ हाथ
वो चला गया है
टूटे रिश्ते की किरचियाँ सारी पानी में बह गई हैं
वो सारा बरसों से बदन पे जमा स्पर्श
रेत में तब्दील हो गया है
और ह्रदय की मुठ्ठी से फिसल रहा है
सब बह गया है,
टूट गया है, बिखर गया है एकबारगी
कांपते हाथों से
वो ढूंढ रही है कोई नज्म कि जिसकी पनाह में
अपने बिखरे शब्द डाल दे.
और मुक्त हो
मुक्त हो एक और रिश्ते से.
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