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16 फ़रवरी, 2009


ब्लॉग्स (1)
कहीं से भी, कभी भीचली आती है वो औरपालथी मार कर बैठ जाती हैघड़ी की सुइओं परवक्त कुछ देर तक दमघोंटू गले सेटिक टिक करता रहता हैऔर फ़िर बंद हो जाता है आखिरकारखूब सारा समय इकठ्ठा हो जाता हैखत्म नही होते दिनलाख भटकने पे भीऔर रात भी मुंदी पलकों के नीचे जागती रहती ... आगे पढ़ें...