शायद जख्म हीं खुराक है मेरी!
जहाँ से भी मिला
जिस भी बदन से
उठा के लाद लिया अपने बदन पे
अब ठीक से याद भी नही
कहाँ से उठाया
किस बदन से कब
इकठ्ठा करता रहा,
आलमारी और रैक भर गए जब
तो दीवान खरीद लिया
अब उनके ऊपर हीं सोता हूं।
आज की तारीख में
ये तय करना मुमकिन नही कि
कौन सा जख्म तो अपने बदन का है और कौन
कहीं से उठाया हुआ
समय के साथ सबका चेहरा एक सा हो गया है
पूरी तरह गड्ड-मड्ड
और फ़िर इतने दिन अपने घर में
रखने के बाद तो
सब अपना हीं लगता है
बहुत बार की है कोशिश कि
किसी पोटली में बाँध कर
दूर फेंक आऊं इन्हें
और पूरी तरह बेजख्म हो जाऊं
प्रण भी किया है कई बार कि
इन जख्मों को उतार के हीं रहूँगा
पर ये मुमकिन नही...
मुमकिन नही क्यूँ कि
शायद जख्म हीं खुराक है मेरी
जख्म खा के हीं जिन्दा हूं !
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