दुःख पे पाँव अगर पड़ जाए
तो दुख बिदक कर काट लेते हैं ।
नज्में सब पीलीं पड़ गई हैं
जाने कब की ये किताब है।
तुम्हारे मन में उमस है, इसलिए
मुझ तक आने के रास्ते सारे चिपचिपे।
अब बस मैं एक रूह हूँ
जीने के लिए बदन उतारने पड़े।
हमने अपना एक जिस्म बनाया है
अब बस एक रूह की आरजू है।
आंखों ने छितकिनी चढा ली है
नींद -ख्वाब सब बाहर।
अभी अभी फ़िर से कोई ख्याल टूटा है
चटखने की आवाज फ़िर से आई है
लोड हो रहा है...
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