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हिचकियाँ


बहुत तेज सन्नाटा है !

सारी आवाजों को दबाए बैठा है
किसी बर्बर तानाशाह की तरह

होंठ के भीतर हीं ,
ये आवाजें,
गले के ठीक नीचे तक भरी
कोई फडफडा रही है , कोई बौखला रही है ,
कोई घुमड़ रही है किसी गुबार की तरह
कोई थक के शांत बैठ गई है

ये दबी हुई आवाजें,
जिनका कि शक्ल अब शोर के जैसा है,
जब बौखलाहट बहुत बढ़ जाती है
हिचकियाँ बन के निकलती हैं
थोड़ा-थोड़ा
सन्नाटे के कान बचाती हुई।


प्रतिक्रियाएँ

Re: हिचकियाँ
अभिव्यक्ति सुंदर है
Re: हिचकियाँ
ओह..अन्दर कुछ उबलने का कितना सुंदर चित्रण है. सुंदर कविता.
अस्वीकरण