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इजहार !


लब्ज सुन लिए गए थे ...

कायनात की सारी आवाजों ने
उन तीन लब्जों के लिए
सारी जगहें खाली कर दी थी

होंठों पे सदियों से जमा वजन
उतर गया था

उसके भीतर कोई नाच उठा था
जो नाचता हीं जा रहा था लगातार
लगातार...

अस्वीकरण