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मकान (1)



ना कोई आर्किटेक्ट ना प्लान
घर बनवा दिया पापा ने

ना ड्राइंग रूम को बड़ा बनवाया
ना किचेन में एग्ज़ॉस्ट फॅन के लिए जगह छोड़ी
वायरिंग भी ठीक से नही करवाई
पवार प्लग तो एक भी डलवाया हीं नही

ऐसा अक्सर सोंचना हो जाता था
जब मैं ज्यादा छोटा था और थोड़ा बड़ा हो गया था

जब भी मौका मिलता था
घर में बात होती थी
बोल देता था
कि ये ठीक नही है, वो ठीक नही है

अब जब
मैं ज्यादा बड़ा हूँ और थोडा छोटा रह गया हूँ,
घर-बाहर
राशन-पानी
नौकरी-चाकरी में
इस तरह दिन छू-मंतर हो जाता है
कि अक्सर सोंचना हो जाता है
पापा ने किस तरह वक़्त निकाल कर
खर्चों पे लगाम डाल कर
एक पाँव पे खडे रह कर
यह मकान बनवाया होगा
कितनी धूप पड़ी होगी पापा पर

अब,
जब भी मौका मिलता है
अपने आराम के समय से थोडा वक़्त निकाल कर
उनके पाँव दाब देता हूँ.


प्रतिक्रियाएँ

Re: मकान (1)
Good Poem.
अस्वीकरण