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नींद्, ख्वाब और कुत्ते





लकड़ियाँ जोड़ी
ऊपले लगाए, तीलियाँ फूँकी
केरोसिन भी डाला,
पर ,
आँच जली नही
नींद कच्ची ही रही.

चाहिए थी एक पकी नींद
दिन भर दौड़ में लगे रहे ख्वाबों को
आराम फरमाने के वास्ते
पर,
खयाल में कुत्ते रोते रहे
और लाख लतियाने पे भी भागे नही

सुबह चाय पीते हुए
उनींदे मन में ये खयाल आ रहा है
कि आखिर
कुत्ते भी क्या करे
उन्हें भी कहाँ वक़्त मिलता है रोने के लिए

और चाय पीने के बाद
देख रहा हूँ कैसे
दौड़ पड़े हैं ख्वाब,
कुत्तों को छोड़ कर

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