वो बिखरती हुई सोंच थी,
जिसे शब्द देकर
समेटने की कोशिश में
लगी रहती थी वो रात दिन
उसे पता था,
घर बंधा रहे
इसके लिए सोंचों का
बंधा रहना बहुत जरूरी है
कई तरह के फ़ासले थे जो
अपनी ताकत से बिखेर देते थे
फिर-फिर उन सोंचों को
जिन्हे वो शब्द देकर बांधती रहती थी
उन नाजुक लम्हों को,
जो कायदे मांगते हैं
पूरी नज़ाकत,पूरी अहमियत खोजते हैं,
वो अपने लहू का सारा स्पर्श देकर
बचाए रखती थी ताकि
वक़्त को बिना दरकाए पार होया जा सके
इसी कोशिश में
वो दस-दस दिनो तक हिलती नही थी
डरती थी कि कहीं
इतने जतन से समेटी हुई सोंचें
किसी पल तिनका तिनका बिखर ना जाए
पर ग्यारहवें दिन किसी तल्ख़ आवाज़ से
वो कांप जाती थी
और
सिमटा हुआ सब बिखर जाता था
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