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27 अगस्त, 2008


ब्लॉग्स (1)
वो बिखरती हुई सोंच थी, जिसे शब्द देकर समेटने की कोशिश में लगी रहती थी वो रात दिन उसे पता था, घर बंधा रहे इसके लिए सोंचों का बंधा रहना बहुत जरूरी है कई तरह के फ़ासले थे जोअपनी ताकत से बिखेर देते थे फिर-फिर उन सोंचों को जिन्हे वो शब्द देकर बांधती रहती थी उन ... आगे पढ़ें...