
ऊग आयी है फसल
बीज जो संकुचित था अपने खोल में
फूट कर बाहर आ गया है
एक नयी आशा जगाता हुआ
माटी आज अहोभाव से भरी
ताक रही है
सूरज के तरफ
सूरज भी
अपने जलन का मुल्य पा चुका है
अपना जला कर भी
अपना गला कर भी
कुछ पैदा कर देता है कोइ जब
तो
कितनी तसल्ली होती है.