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निष्ठुर

भूख थे वहाँ कतार में खड़े
और
पेट उनके, आग में पक रहे थे

चेहरे पहले लार लार हुए
फिर सूख कर लटक गये
इंतेज़ार में,
जीभ पपड़ीदार हुए फिर
आस में भोजन के
मगर शर्म नही आयी उसे.

वो भीतर
आसन पे विराजमान
अपने
दप-दप करते चेहरे के साथ
मजे से
चढ़ावे खाता रहा.



प्रतिक्रियाएँ

Re: निष्ठुर
समाजवादी सोच अब सिर्फ कवियो मे ही बाकी रह गया है. आप जैसे सम्वेदंशील लोग वक्त की जरूरत है
अस्वीकरण