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अगस्त 2008


ब्लॉग्स (13)
लकड़ियाँ जोड़ी ऊपले लगाए, तीलियाँ फूँकी केरोसिन भी डाला, पर ,आँच जली नहीनींद कच्ची ही रही. चाहिए थी एक पकी नींद दिन भर दौड़ में लगे रहे ख्वाबों कोआराम फरमाने के वास्तेपर, खयाल में कुत्ते रोते रहे और लाख लतियाने पे भी भागे नही सुबह चाय पीते हुए उनींदे मन ... आगे पढ़ें...

घर की अलगनी पे अंबार लगता जा रहा है एक के ऊपर एक गीली सोंचों का मैने खोल दिए हैं सारे दरवाजे, खिड़कियां और छत कोई भी गुंजाइश नही छोड़ी है किसी भी धूप के टुकड़े के लिए आसान है सोंचों को गीला छोड़ देना मगर फिर कितनी देर टिकी रहेगी अलगनी !! आगे पढ़ें...

वो बिखरती हुई सोंच थी, जिसे शब्द देकर समेटने की कोशिश में लगी रहती थी वो रात दिन उसे पता था, घर बंधा रहे इसके लिए सोंचों का बंधा रहना बहुत जरूरी है कई तरह के फ़ासले थे जोअपनी ताकत से बिखेर देते थे फिर-फिर उन सोंचों को जिन्हे वो शब्द देकर बांधती रहती थी उन ... आगे पढ़ें...

जिंदगी की कहानी, कुछ हट केथोड़ी अलग सी बनानी है. काट-छांट कर अलग करना है उन चीज़ो को जो फालतू जगह घेरे बैठी है जिंदगी के प्रस्तुतिकरण को भद्दा बनाती हैएक कहानी जो कोशिश करती हो, सिर्फ वकालत नही. लड़ती हो जरूरत पड्ने परमर भी जाती हो बिना ज्यादा परवाह किए, ... आगे पढ़ें...

हम साथ साथ नही भाग पायेबचपन मेंटिकोले लुटने या अमरूद तोडने के वास्तेना हमने आपस में मार- पीट कीकभी पतंग के लियेना छीना झपटी कभीवो मुझसे पांच साल बडा थाऔर वक्त के अंतर नेहमारी प्राथमिकताये अलग कर दी थीजब मैं अमरूद के पेंडो के इर्द्- गिर्द घूम रहा थावो शायद ... आगे पढ़ें...

ऊग आयी है फसलबीज जो संकुचित था अपने खोल मेंफूट कर बाहर आ गया हैएक नयी आशा जगाता हुआमाटी आज अहोभाव से भरीताक रही हैसूरज के तरफसूरज भी अपने जलन का मुल्य पा चुका हैअपना जला कर भीअपना गला कर भीकुछ पैदा कर देता है कोइ जबतोकितनी तसल्ली होती है. आगे पढ़ें...

मुझे उतार दिया जाएगा कुछ देर में हीं चढ़ते जा रहे बाजार की नजर से‘सेल में लगी पुराने उत्पादों के बीच डाल दिया गया है मुझे जिन्हे आने वाले उत्तेजक आइटमों के खातिर जगह बनाने के लिए औने पौने दामों में खपा देने की होड़ मची है. आगे पढ़ें...

भूख थे वहाँ कतार में खड़े और पेट उनके, आग में पक रहे थे चेहरे पहले लार लार हुएफिर सूख कर लटक गयेइंतेज़ार में, जीभ पपड़ीदार हुए फिरआस में भोजन केमगर शर्म नही आयी उसे.वो भीतर आसन पे विराजमान अपनेदप-दप करते चेहरे के साथ मजे से चढ़ावे खाता रहा. आगे पढ़ें...

दिल से जो चले गये, उन दर्दों के लिए,जाने क्यूँ कभी-कभीदिल बड़ा बेकरार रहता है और जो गये नही अब तकवो बैठे हैं जाम लेके होश उनको जरानागवार रहता है.कुछ ऐसे भी दर्द हैंजो पड़े हैं बरसों से,पत्ते खेलने के लिए जिन्हें, शाम कोकुछ और दर्दों का इंतिज़ार रहता ... आगे पढ़ें...

नींद औंधा पड़ा है रजाई में सिकुड़ कर, बाहर, आंगन में नींद से बिछुड़े हुए ख्वाब टूट-टूट कर गिर रहे हैं निहायत बेकार सा कोई वक़्त अपने टखने में दर्द लिए चल रहा है. ऐसे मेंतुम्हारेहाथों से एक कप चाय हो जाये अगर... आगे पढ़ें...

जीवन के सारे स्वाद हो चुके हैं नीम, मीठे स्वाद की याद बच नही पाएगी अब और ज्यादा देर. साँसों की यात्रा में दूर दूर तक फैला हुआ कोलतार है दममें की उठा पटक है धुआँ है, गुबार है भयाक्रांत है बची हुई थोड़ी सी पारदर्शी हवा हम, तुम, सब जानते हैं हवा, पानी और ... आगे पढ़ें...

अभी से शायद कुछ देर पहले हीं उसने अपनी हीं बनाई दुनिया को बेसहारा कर दिया और ये दुनिया चरमरा कर गिरने लगी. अहं का ये कैसा घिनौना प्रदर्शन कि हमारे कान टूटने के शोर से भर गये !!!मैं उसका विरोध करता हूँ क्यों कि वो जब-तब हाथ खींचता रहता हैअपनी हीं बनाई ... आगे पढ़ें...

वो कुछ हाथ थे, जो निकल गये हाथ से वो कुछ हाथ थे मैं चाहता हूँ कि, जो मेरा कंधा ले लें फिर से अपने घेरे में. वो कुछ हाथ थे जो अक्सर, स्कूल जाते वक़्त कंधे घेर कर लटक जाते थे दूसरी तरफ वे कुछ हाथ थे जो लगभग रोज बाँट लेते थे चाट और पानी-पूड़ी, अमरूद और ... आगे पढ़ें...