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अगस्त 2008


ब्लॉग्स (13)
लकड़ियाँ जोड़ी ऊपले लगाए, तीलियाँ फूँकी केरोसिन भी डाला, पर ,आँच जली नहीनींद कच्ची ही रही. चाहिए थी एक पकी नींद दिन भर दौड़ में लगे रहे ख्वाबों कोआराम फरमाने के वास्तेपर, खयाल में कुत्ते रोते रहे और लाख लतियाने पे भी भागे नही सुबह चाय पीते हुए उनींदे मन ... आगे पढ़ें...

घर की अलगनी पे अंबार लगता जा रहा है एक के ऊपर एक गीली सोंचों का मैने खोल दिए हैं सारे दरवाजे, खिड़कियां और छत कोई भी गुंजाइश नही छोड़ी है किसी भी धूप के टुकड़े के लिए आसान है सोंचों को गीला छोड़ देना मगर फिर कितनी देर टिकी रहेगी अलगनी !! आगे पढ़ें...

वो बिखरती हुई सोंच थी, जिसे शब्द देकर समेटने की कोशिश में लगी रहती थी वो रात दिन उसे पता था, घर बंधा रहे इसके लिए सोंचों का बंधा रहना बहुत जरूरी है कई तरह के फ़ासले थे जोअपनी ताकत से बिखेर देते थे फिर-फिर उन सोंचों को जिन्हे वो शब्द देकर बांधती रहती थी उन ... आगे पढ़ें...