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यूँ हीं तो नही कभी भी


यूँ हीं नही
यूँ हीं तो नही कभी भी
कभी बैठा नही यूँ हीं
और कभी चला भी नही

सब कुछ किया मकसद से
हमेशा चला उधर, जिधर लगा कि मंजिल है
भागता रहा ख्वाब – ख्वाब,
परवाह नही की
ख़ुरदुरी जमीन और ऊबड़ खाबड़ रास्तों की,
सब तय किया
जैसा भी जरूरी लगा उस वक़्त
याद नही रखा- कौन सा वर्ष,
महीना और कौन सा दिन.

वही वक़्त है
आज कहता है- जी गये तुम मुझे यूँ हीं
किया नही कुछ भी.

प्रतिक्रियाएँ

Re: यूँ हीं तो नही कभी भी
बढिया रचना है।
Re: यूँ हीं तो नही कभी भी
sraddha se swikar karta hoon, naman aapko paramjit ji.
अस्वीकरण