इजाज़त
मुझे तुझमे थोड़ी देर और रूकना था
अब तक तो सोते हुए गुजर गयी थी
अब जागना था
जग कर जीना था
कुछ जागे पलों को इकठ्ठा करने तक और रूकना था
बीज के खोल से बाहर निकल कर
अंकुराना था, माटी पकड़नी थी,
कम से कम कोंपलों के आने तक और रूकना था
पनाह में तेरे, खुद को डाल कर
अपने गुनाहों को समेटने तक
और रूह कि शक्ल से रूबरू होने तक और रूकना था
पर तुमने आंगन बदल कर
दरवाजे पे कुंडली चढ़ा ली
और मैं तुमसे
कह भी ना पाया कि
मुझे तुझमे थोड़ी देर और रूकना है.
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