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22 जुलाई, 2008


ब्लॉग्स (1)
मुझे तुझमे थोड़ी देर और रूकना था अब तक तो सोते हुए गुजर गयी थी अब जागना था जग कर जीना था कुछ जागे पलों को इकठ्ठा करने तक और रूकना था बीज के खोल से बाहर निकल कर अंकुराना था, माटी पकड़नी थी, कम से कम कोंपलों के आने तक और रूकना था पनाह में तेरे, खुद को डाल ... आगे पढ़ें...