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तिनका

कुछ मैं नही छोड़ पाया था
कुछ
वो भी नही छोड़ पाई थी
और
इस तरह हम छूट गये थे
एक दूसरे से

जब धार पे ख़ड़ा हो
तो कितनी देर रुका रह सकता है
कोई बिना बहे,
और उस धार में तो हम तिनकों जैसे थे.

वो जो हम नही छोड़ पाए थे तब
वो सब भी छूट गये धीरे धीरे
वक़्त ने नयी – नयी धारें बनाई आगे फिर

……………………………….
…………………………………

आदमी तो तिनका ही है
और धारें तो बदलती रहती हैं.


प्रतिक्रियाएँ

Re: तिनका
सुन्दर अभिव्यक्ति है।
Re: तिनका
shukriya paramjit ji
अस्वीकरण