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महानगर में दर्द

जब जब मैं उदास हुआ
वो भी हुआ
उसने अपनी लहरें खोल दी
समेटने के लिये
मेरी बेचैनियों और उदासियों को.

जब मैं रोना चाहता था
पर आँसू नही होते थे
तो उसने आंखो को आंसू दिये
और घंटों तक अपने कंधे का किनारा दिया.

हमने देखा है
और वो समेटता रहता है
अपनी लहरें फैला फैला कर
लोग किनारे की रेत पे जो अपने दर्द छोड़ देते हैं .

कभी सोंचता हूँ तो लगता है
समुद्र अक्सर महानगरों के पास होते हीं इसलिए हैं क्योंकि
महानगर में दर्द फाज़ील होते है
और उन्हें समेटने के लिये बाहें कम


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