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आज भी खड़ी हूँ !!!!!!!


सालों साल
फटी, उघडी देह में जीते हुए
तुम्हारे आने की आस तापती रही
और हमेशा उस किनारे से लगी रही
जहाँ से तुम्हारी धार गुजरनी थी

आज भी खड़ी हूँ
तू किधर से भी आ
मैं बह चलूंगी.


अस्वीकरण