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6 जून, 2008


ब्लॉग्स (1)
वो सूखा खड़ा था वहाँ, जब दुबारा आगोश में भरा था उसने फिर उसी पुरजोर कशिश के साथ. कुछ बरस पहले वो हरा था और ऐसी घनी छाँव थी उसकी कि गुजरते हुए कोई भी रूक जाता था वहाँ फिर छूटती गयी थी हरियाली गिरती गयी थी पत्तियाँ एक एक कर.उसने बाहें ढीली कर दिन थी दरअसल. ... आगे पढ़ें...