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5 जून, 2008
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जरा सा रह गया है वक्त !
जरा सा रह गया है नदियों में पानी उसी के लिए चल रही है मारा-मारी .जरा सी रह गयी है पुरानी घनी छाँवउनपे भी जल्दी हीं चलने वाली है कुल्हाड़ी जरा सी रह गयी है फ़िज़ा में नरम, ताजी हवा जो सबसे तेज दौड़ पाएंगे वही सांस ले पाएंगे. जरा सी बच गयी है मौसमों में ...
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थोड़ा सा आसमान
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Om Arya
द्वारा 5 जून, 2008 12:24 PM पर पोस्टेड
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सोंचा आपको भी बता दूँ.
जैसे आप खो गये हों कहीं मान लो, किसी अनजाने ग्रह पे आप सा वहाँ कोई नही आपकी आवाज़ कोई पहचानता नही आपकी बोली में कोई बोलता नही कोई अपना सा खोजते खोजते आपका दम टूटने लगा हो पुकारते पुकारते आपके कंठ सूख रहे हो और आप बदहवास से भागते हुए ढूंढ रहें हो इधर-उधर ...
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Om Arya
द्वारा 5 जून, 2008 12:13 PM पर पोस्टेड
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अब तलक है कशमकश ये जारी
एक अधूरी नज्म है. बाल्कनी में चहलकदमी करती हुई. खंगालती हुई कुछ पुराने मौसम. दिमाग की नसें छेड़ती हुई वो गुजर रही हैं अनजान राहों से जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं भनभनाते हुए दिमाग मेंजो हटाये नही हटतेऔर डांटने पे मुँह फुला के बैठ जाते हैं मैं जोडता ...
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Om Arya
द्वारा 5 जून, 2008 10:02 AM पर पोस्टेड
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