एक अधूरी नज्म है.
बाल्कनी में
चहलकदमी करती हुई.
खंगालती हुई कुछ पुरानी ऋतुएं.
दिमाग की नसें छेड़ती हुई
वो गुजर रही हैं अनजान राहों से
जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं
सिगरेट की धुएँ से जो छिड़ जाते हैं.
मैं जोड़ता हूँ, तोड़ता हूँ,
निकालता हूँ, मिलाता हूँ,
सिलसिला ये कल सुबह से हीं चल रहा है
और आधी रात होने को आई अब.
हम भी
क्या करें पर,
नज्म में उतर ही नही रहा, तेरा वो गुलाब मौसम,
जिसको बयान करके इसे होना था मुकम्मल.
लब्ज भी अब बैठ गये हैं मुँह फूला के
जाने कब तलक रहेंगे ये रूठे हुए.
पर कशमकश तो अब तक है जारी
सोंचता हूँ
आपको भी छोड़ दूँ इसी कशमकश में
या कह दूँ
यार, रात एक नज्म अधूरी रह गयी.

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