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4 जून, 2008


ब्लॉग्स (1)
एक अधूरी नज्म है. बाल्कनी में चहलकदमी करती हुई. खंगालती हुई कुछ पुरानी ऋतुएं. दिमाग की नसें छेड़ती हुई वो गुजर रही हैं अनजान राहों से जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं सिगरेट की धुएँ से जो छिड़ जाते हैं. मैं जोड़ता हूँ, तोड़ता हूँ, निकालता हूँ, मिलाता ... आगे पढ़ें...