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जून 2008


ब्लॉग्स (9)
कल रात भर करवटे बदली शाम से ही समंदर बहुत रहा बेचैनकई बार उठा बिस्तर सेकई बार हाथ पाँव धोयेटहला भी बालकनी में काफी देर तकपानी निकाल कर पिया फ्रीज सेसब तरह के संघर्ष से गुजरापर लहरों को नींद नही आयीकल की पूरी रातहाँ पूरी एक राततेरे ख्वाब ने सोने ना दिया. आगे पढ़ें...

कडी धूप में जिंदगी तप रही हैमैने तेरे सारे छाव खो दिये हैंबादल को मैने कहा था कभीबूँदें तुझे एक दिन छोड़ देंगीमुहव्वत की ताजी नजर से गिरी होकायनात को तुम डूबो के रहोगी सबकुछ ही बिल्कुल हो जब सही नाकाम लब्जे फिसल जाती हैं एन वक्तजब छोड़ दिया उसने ख्वाबों ... आगे पढ़ें...

हालांकि, मैने छोड़ दिए हैं देखने वे ख्वाब पर, मेरे कंधे पर अभी भी आ टिकता है चेहरा तेरा और मेरे सीने को जब तब घेर लेती हैं बाजुएं तुम्हारी उन ख्वाबों मेंमेरी कनपटियो से छूती हुई अभी भी निकल जाती हैं तुम्हारी अलाव सी साँसे जो कभी ठंढी नही होती और जो फूंक ... आगे पढ़ें...

वो सूखा खड़ा था वहाँ, जब दुबारा आगोश में भरा था उसने फिर उसी पुरजोर कशिश के साथ. कुछ बरस पहले वो हरा था और ऐसी घनी छाँव थी उसकी कि गुजरते हुए कोई भी रूक जाता था वहाँ फिर छूटती गयी थी हरियाली गिरती गयी थी पत्तियाँ एक एक कर.उसने बाहें ढीली कर दिन थी दरअसल. ... आगे पढ़ें...

जरा सा रह गया है नदियों में पानी उसी के लिए चल रही है मारा-मारी .जरा सी रह गयी है पुरानी घनी छाँवउनपे भी जल्दी हीं चलने वाली है कुल्हाड़ी जरा सी रह गयी है फ़िज़ा में नरम, ताजी हवा जो सबसे तेज दौड़ पाएंगे वही सांस ले पाएंगे. जरा सी बच गयी है मौसमों में ... आगे पढ़ें...

जैसे आप खो गये हों कहीं मान लो, किसी अनजाने ग्रह पे आप सा वहाँ कोई नही आपकी आवाज़ कोई पहचानता नही आपकी बोली में कोई बोलता नही कोई अपना सा खोजते खोजते आपका दम टूटने लगा हो पुकारते पुकारते आपके कंठ सूख रहे हो और आप बदहवास से भागते हुए ढूंढ रहें हो इधर-उधर ... आगे पढ़ें...

एक अधूरी नज्म है. बाल्कनी में चहलकदमी करती हुई. खंगालती हुई कुछ पुराने मौसम. दिमाग की नसें छेड़ती हुई वो गुजर रही हैं अनजान राहों से जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं भनभनाते हुए दिमाग मेंजो हटाये नही हटतेऔर डांटने पे मुँह फुला के बैठ जाते हैं मैं जोडता ... आगे पढ़ें...

एक अधूरी नज्म है. बाल्कनी में चहलकदमी करती हुई. खंगालती हुई कुछ पुरानी ऋतुएं. दिमाग की नसें छेड़ती हुई वो गुजर रही हैं अनजान राहों से जहाँ और भी कई गुस्ताख़ से लब्ज हैं सिगरेट की धुएँ से जो छिड़ जाते हैं. मैं जोड़ता हूँ, तोड़ता हूँ, निकालता हूँ, मिलाता ... आगे पढ़ें...

रूह के साथजरा सा भी रोमांसजारी नही है अब.जाने कैसेदेह की मांगे बढती हुईयहाँ तक पहूंच गयीकि सारी रूह मिट गयीपूर्ति में ही.ना प्रार्थना साफ रहीना प्रेम सफेदऔर ना ध्यान शांत हर तरफ आवाजें हैं बाजार कीऔर चीजेंजिसमें से छांटो तो जरा सा सूकून भी नही निकलता.किस ... आगे पढ़ें...