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याद में

इस लड़खड़ाती रात में
उसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँ

उसकी यादों का जिंदा वजूद
मेरे हर गिरते पल को थाम लेता है

याद में ये राहें इतनी व्यस्त नही हैं
वहाँ प्यार से चलने के लिये जगह भी है और वक़्त भी
उन पर जरा बेफिक्र हो कर चला जा सकता है

याद में उसकी लबे हैं पंखुडी जैसी
जहाँ गुलाब महकता है
एक लहर है नजरों में
जिस पर समंदर बहकता है

यादो में ही रहना हो रहा है आजकल
यादो में सुकून है जरा.

प्रतिक्रियाएँ

Re: याद में
आपकी कविताएं पढ़ता रहता हूं। ये कविताएं एक भावुक मन की कविताएं हैं। कई बार मुझे लगता है कि क्या कविता को हमेशा भावुक ही बने रहना चाहिए या उसका दूसरा भी कोई काम है। मैं जानता हूं कि हर कवि की खास तरह की संवेदनाएं होती हैं जिसके अधीन वह लिखता है। आप भी अपनी खास तरह की संवेदनाअों के तहत ही कविता लिखते होंगे। लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि एक ही कवि दो भिन्न आस्वाद देने वाली कविताएं लिखता है। जैसे निराला ने जूही की कली भी लिखी, वह तोड़ती पत्थर भी लिखी ओऱ राम की शक्ति पूजा भी लिखी। आशा करता हूं कि आप कभी-कभी अपने इस भावुक मन से बाहर निकल कर भी कुछ दूसरी तरह की कविताएं लिखने की कोशिश करेंगे।
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