छोटी सी इक छूअन धीमे से तुम्हारी उंगलियों में फँसाया था कभी वो भी ख्वाब में और कैसे धौंकनी हो गयी थी तुम्हारी साँसे पीछे दीवार से टिका कर तेरी पीठ मैने देनी चाही थी तुम्हें अपनी लावा साँसे याद है? पर तुमसे सहेजा ना गया था तुम अकबका कर चली गयी थी ख्वाब ...
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