हमने अपने दिल ही नही कुरेदे.
ये सोंच कर कि
हवा, पानी, रोशनी रोक ली जाएगी,
बीज हमने दबाए ही नही माटी में
और रोक दी सम्भावना किसी खूबसूरत रचना की.
तब ख्वाब में उगे वे बीज
वहाँ वे खिले,लहलहाए और मुस्कुराये
खूब खुशबूएं बिखेरी
वे बाहर भी आयी उनके पोरों से
बाहर आकर उन्होने दुनिया देखी
वे और लहलहाए, और मुस्कुराए, और भी फूल लाए
उन्हे हवा भी मिली, रोशनी और धूप भी
कई बार हम नाहक ही
कुछ बीजो को वैसा ही छोड़ देते हैं
अपनी सोंच में उपजी डर के कारण
और पहूंच नहीं पाती कुछ खुशबूएं दुनिया तक

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