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2 मई, 2008


ब्लॉग्स (2)
एक तो अपनी ...और दूसरी तुम्हारी...दोहरी तनहाई में जीता हूँ रोजशायद तुम भी जीती होगी कुछ इस तरह हीरोज शाम वे दोनो ही मिल जाती हैंसमंदर के साहिल के समानांतर बैठी हुईतुम्हे भी दिखाई दे ही जाती होगी कभी शायदवे रहती हैं सूरज डूबने तक वहींमैं लौट आता हूँ उन्हें ... और पढ़ें...

तुझे देख कर ख्वाब में, रात सोया था मैं कल रातकल रात नींद आयी थी.आज जागने की तबीयत ही नही हुई गरम रहे तकिए, गद्दे और विस्तर सुबह तकगरम रहे मेरे कान पिघल कर बहती रही आरजुए देर तकतुझे देख कर ख्वाब मेंएक और वैसे ही ख्वाब के इंतिज़ार मेंजागा ही नही आज बडी देर ... और पढ़ें...