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मई 2008


ब्लॉग्स (12)
धूप में पड़े रहे वो.पह्ले रंग उतरे उनकेऔर फिर धीरे - धीरे उनकी चिद्दिया उड़ती चली गयी छाव खींच कर वेआशियाना बना लिये होते, गरएक ने दूसरे की जिद मान ली होतीमगर वे अड़े रहेन छाव खींची, न जिद अपनीपड़े रहे वे धूप में चिद्दिया उड़ने तक.जाने क्यू, जाने कैसे! आगे पढ़ें...

समय घिस-घिस कर फटता रहाऔर हम उनपे पैबंद लगाते रहेकुछ यूँ ही गुजरी जिंदगी हमारीहालात तो हमने ढक दिये पैबंदो सेपर पैबंदो को हम नही ढक पाये. आगे पढ़ें...

मैं अपना नाम लेकरउसे आवाज देता रहाउसने मेरा नाम न अपने कानो पे रखाऔर ना ही लबो पे आने दियातडपती रही वो आवाजें मैं अनसुना ही रहा और वो अनकही ही आगे पढ़ें...