सालों साल तक सुखता रहा दरख्त
मगर बूँदों को बरसने का खयाल नही आया
जाने दरिया कैसा सख्त रहा होगा
उमड़ नही पाया होगा जो इतने लम्बे अरसे तक
दरख्त को अकेला सूखता देखकर भी
पहले पत्ते छुटे हाथ से
फिर एक एक कर छुटी टहनिया
चमड़ी भी उधडी फिर
और दरारें भी पडी आखिर में हड्डियों में
पर दरिया की आंख नम नही हुई
एक दिन तब ऊठा आग दरख्त से
लपटो और गुबार की शक्ल में
और जल गया वो
जला तो दरख्त ही
पर काला बादल ही हुआ
और राख दरिया में ही गिरी.

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