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15 अप्रैल, 2008


ब्लॉग्स (2)
तू किनारे पे करना इंतेज़ार साकी मैं लौटूँगा फिर इस पार साकी बिक जाएंगे एक दिन कौडियो में सब तब भी बच जाएंगे ये बाजार साकी अरसे से महरूम रखा आँसुओं से आँखों का हूँ बड़ा मैं गुनहगार साकी तेरे घर का दरवाजा हर दफ़ा बंद मिला हम गुजरे तो तेरी गली से कई बार ... और पढ़ें...

सालों साल तक सुखता रहा दरख्तमगर बूँदों को बरसने का खयाल नही आयाजाने दरिया कैसा सख्त रहा होगाउमड़ नही पाया होगा जो इतने लम्बे अरसे तकदरख्त को अकेला सूखता देखकर भीपहले पत्ते छुटे हाथ सेफिर एक एक कर छुटी टहनियाचमड़ी भी उधडी फिरऔर दरारें भी पडी आखिर में ... और पढ़ें...