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साकी...(1)

वहीं पे है पडा अभी तक वो जाम साकी
निकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकी

नजर में ठहरी हुई है वो तेरी महफिल अभी तक
जो पी आया तेरे होठो से एक कलाम साकी

हो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम
कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकी

मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी

लिखने लगे जो अपनी दास्तान साकी,
उसमें आने लगा बार बार तेरा नाम साकी

खुदा हाफिज़ करने में है न अब कोइ गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी
अस्वीकरण